
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित देश के जाने-माने साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर पूरे छत्तीसगढ़ में शोक का माहौल है। राज्य सरकार ने उनके अमूल्य साहित्यिक योगदान और प्रदेश का मान वैश्विक स्तर पर बढ़ाने के सम्मान में उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ करने का निर्णय लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, बुधवार को रायपुर में उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी। इस दौरान पुलिस बल द्वारा उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा और शासन के वरिष्ठ प्रतिनिधि भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करने मौजूद रहेंगे।
मुख्यमंत्री ने जताया दुख: बताया प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रख्यात साहित्यकार के निधन को साहित्य जगत के एक युग का अंत करार दिया है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी लेखनी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की मिट्टी की महक को पूरी दुनिया तक पहुँचाया है। मुख्यमंत्री ने इसे व्यक्तिगत और प्रदेश के लिए एक ऐसी क्षति बताया जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है। सरकार का मानना है कि शुक्ल जी ने जिस सादगी और गहराई के साथ जनजीवन को अपनी रचनाओं में ढाला, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक रहेगा। उनके सम्मान में शासन ने विदाई की सभी औपचारिकताएं पूरी गरिमा के साथ निभाने के निर्देश दिए हैं।
सादगी और संवेदनशीलता की मिसाल था शुक्ल जी का साहित्य
विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के उन गिने-चुने रचनाकारों में शामिल थे, जिन्होंने भाषा के साथ नए प्रयोग किए। 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे शुक्ल जी ने शिक्षण कार्य को आजीविका बनाया और अपना पूरा जीवन साहित्य साधना में समर्पित कर दिया। उनकी शैली इतनी सहज थी कि आम आदमी भी उससे जुड़ाव महसूस करता था। वर्ष 2024 में उन्हें 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, जिससे वे इस सम्मान को पाने वाले छत्तीसगढ़ के पहले लेखक बने। उनकी रचनाओं में ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसे कालजयी उपन्यास शामिल हैं, जिन्होंने भारतीय कथा-साहित्य को एक नया ढांचा और दृष्टि प्रदान की।

वैश्विक पटल पर छत्तीसगढ़ का बढ़ाया मान
विनोद कुमार शुक्ल केवल एक कवि या कथाकार नहीं थे, बल्कि वे मानवीय संवेदनाओं के पारखी थे। उन्होंने अपनी कविताओं और उपन्यासों के जरिए मध्यवर्गीय जीवन की बारीकियों और आधुनिक मनुष्य की उधेड़बुन को बड़ी कुशलता से उभारा। उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणिकौल ने फिल्म भी बनाई थी, जिसे काफी सराहा गया। अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और उत्कृष्ट सृजनशीलता की वजह से वे भारतीय वैश्विक साहित्य के शीर्ष स्तंभों में गिने जाते रहे। आज उनके चले जाने से साहित्य का वह कोना सूना हो गया है जहाँ साधारण शब्दों में बड़े सत्य कहने की परंपरा जीवित थी।
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