राजिम पुन्नी मेला: अपनी ही जमीन पर ‘बेगाने’ हुए स्थानीय लोग, अफसरशाही और बैरिकेडिंग से आस्था के उत्सव में बढ़ा आक्रोश

Rajim Mela: राजिम का ऐतिहासिक माघी पुन्नी मेला कभी अपनी स्वच्छंदता और लोकजीवन के लिए जाना जाता था, लेकिन अब इसकी मूल पहचान खोती जा रही है। राजिम के स्थानीय निवासियों का कहना है कि जो मेला कभी जन-जन का उत्सव हुआ करता था, वह अब केवल ‘इवेंट’ बनकर रह गया है। पुराने समय में श्रद्धालु बिना किसी रोक-टोक के त्रिवेणी संगम की धारा में स्नान करते थे, लेकिन अब नदी किनारे की प्राकृतिक रौनक गायब है। बाहरी हस्तक्षेप और अत्यधिक सजावट ने इस पारंपरिक पर्व की आत्मा को चोट पहुंचाई है, जिससे बुजुर्गों और महिलाओं में काफी निराशा है।

अफसरशाही और बैरिकेडिंग का सख्त पहरा

मेला क्षेत्र में जगह-जगह की गई बैरिकेटिंग ने इसे किसी उत्सव के बजाय प्रतिबंधित क्षेत्र जैसा बना दिया है। सुरक्षा के नाम पर तैनात पुलिस और प्रशासन के रवैये से श्रद्धालु खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि बार-बार रास्ते बदलना और पूछताछ करना आस्था के इस पर्व में भय पैदा कर रहा है। प्रशासन ने मेले को शहर की बसाहट से दूर नए मैदान में स्थानांतरित कर दिया है, जिससे स्थानीय नागरिकों को वहां तक पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। राजिम के लोगों के लिए अब यह मेला अपना कम और सरकारी ज्यादा लगने लगा है।

इवेंट संस्कृति से खत्म हो रही लोक परंपरा

राजिम के लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने मेले को एक व्यावसायिक आयोजन में तब्दील कर दिया है। चमक-धमक और आधुनिक कार्यक्रमों के चक्कर में सदियों पुरानी ग्रामीण परंपराएं पिछड़ गई हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब यह मेला राजिम की माटी का है, तो नीति निर्धारण में उनकी राय क्यों नहीं ली जा रही? केवल वीआईपी कल्चर और पास-सिस्टम पर जोर देने से आम श्रद्धालुओं की श्रद्धा आहत हो रही है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल एक सरकारी प्रदर्शन के रूप में याद रखेंगी।

प्रशासन को आत्ममंथन की जरूरत

मेले में बढ़ते असंतोष को देखते हुए अब मांग उठने लगी है कि प्रशासन अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करे। मेले को फिर से जन-साधारण का पर्व बनाने के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है। यदि सुरक्षा के नाम पर असंवेदनशील व्यवहार नहीं रुका, तो आने वाले दिनों में यह विरोध और भी उग्र रूप ले सकता है। जरूरत इस बात की है कि आस्था और व्यवस्था के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया जाए जिससे राजिम पुन्नी मेले की पवित्रता और लोगों की आजादी बनी रहे।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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