
Maa Bhaneshwari Temple Singola Rajnandgaon: भारतभर में जब भी शारदीय या चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व आता है, तो मंदिरों में कलश स्थापना की शुरुआत आमतौर पर पंचांग की तिथियों के अनुसार की जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित सिंघोला गांव का मां भानेश्वरी मंदिर इस मामले में देश भर के बाकी देवी मंदिरों से बिल्कुल अलग है। यहां नवरात्रि की शुरुआत तिथियों के घटने या बढ़ने से तय नहीं होती, बल्कि इसके लिए वार की गणना की जाती है ताकि नौ दिनों का पर्व पूरी शुचिता और नियम के साथ संपन्न हो सके।
राजनांदगांव के सिंघोला में स्थित है आस्था का यह प्रमुख केंद्र
Rajnandgaon Singola Devi Mandir Special Story: राजनांदगांव जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित ग्राम सिंघोला का मां भानेश्वरी मंदिर क्षेत्र के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शुमार है। नवरात्रि के विशेष दिनों में यहां दूर-दराज के अंचलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन और वंदना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के शांत परिसर में जलने वाले ज्योति कलश और गूंजते देवी गीतों से पूरा वातावरण पूरी तरह से आध्यात्मिक और भक्तिमय हो जाता है, जो आने वाले हर व्यक्ति का मन मोह लेता है।
तिथियों का गणित छोड़ वार के हिसाब से तय होती है नवरात्रि की शुरुआत
Navratri Tradition Maa Bhaneshwari Singola: आम तौर पर प्रतिपदा तिथि के आधार पर नवरात्रि के दिन घटते या बढ़ते हैं, लेकिन सिंघोला के इस मंदिर की परंपरा बिल्कुल अनूठी है। यहां नौ दिनों के इस पवित्र पर्व को पूरा करने के लिए वार के अनुसार शुरुआत तय करने का विधान है। पंचांग में तिथियों के कम या ज्यादा होने के बावजूद यहां की परंपरा के अनुसार पूरे नौ दिनों तक ही उत्सव मनाने का नियम कड़ाई से निभाया जाता है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग पहचान देता है।

पुरुष निभाते हैं जंवारा बोने से लेकर कलश विसर्जन तक की विशेष जिम्मेदारी
Singola Bhaneshwari Temple Unique Traditions: इस मंदिर की एक और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां धार्मिक अनुष्ठानों में पुरुषों की भूमिका बहुत खास होती है। सामान्य तौर पर घरों और मंदिरों में महिलाएं जंवारा बोती हैं और कलश संभालती हैं, लेकिन यहां परंपरा के अनुसार पुरुष ही जंवारा बोते हैं। इसके अलावा नवरात्रि के समापन के दिन जब ज्योति कलशों के विसर्जन की बेला आती है, तब उन्हें उठाने की जिम्मेदारी भी पुरुष ही निभाते हैं।
मां भानेश्वरी के रूप में पूजी जाती हैं भानुमति, 1975 में ली थी जीवित समाधि
स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार मां भानेश्वरी का जन्म नौ मई 1911 को भानुमति के रूप में हुआ था। किशोरावस्था के दौरान उनके जीवन में कुछ ऐसी अलौकिक घटनाएं हुईं, जिसके बाद से ग्रामीण उन्हें साधारण मनुष्य के रूप में न देखकर देवी का स्वरूप मानने लगे। आगे चलकर तीन नवंबर 1975 को उन्होंने सिंघोला में ही जीवित समाधि ले ली थी। उनकी याद और आस्था में बाद में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज एक सिद्धपीठ बन चुका है।
संतान प्राप्ति की मन्नत लेकर पहुंचते हैं निसंतान दंपती
क्षेत्र के लोगों की इस मंदिर के प्रति अटूट श्रद्धा है और मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है। विशेष रूप से वे दंपती जिन्हें संतान का सुख प्राप्त नहीं होता, वे यहां आकर माता के दरबार में प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि के इन पवित्र दिनों में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है और माता के जयकारों से पूरा सिंघोला क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है।
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