
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में बुधवार को आयुष्मान भारत योजना की बदहाली का मुद्दा गूंजा। ताज्जुब की बात यह रही कि इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल को केवल विपक्ष ने ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ विधायकों ने भी जमकर घेरा। सदन में आयुष्मान कार्ड के माध्यम से इलाज न मिलने और निजी अस्पतालों की मनमानी को लेकर तीखी बहस हुई। सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार के मंत्री से दो-टूक कहा कि यह प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण योजना है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इलाज के लिए भटक रहे मरीज: कविता प्राण लहरे ने बताया जमीनी सच
विपक्षी विधायक कविता प्राण लहरे ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए आयुष्मान योजना की खामियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई बड़े निजी अस्पताल कार्डधारियों को भर्ती करने में आनाकानी कर रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि इस योजना के तहत गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधा भी सुचारू रूप से नहीं मिल रही है। मरीज अस्पताल दर अस्पताल भटक रहे हैं, लेकिन उन्हें कार्ड होने के बावजूद नकद भुगतान के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से पूछा कि आखिर गरीब मरीजों की इस परेशानी का अंत कब होगा?
भाजपा के दिग्गज हुए हमलावर: अजय चंद्राकर और धर्मजीत सिंह ने दिखाए कड़े तेवर
सत्ता पक्ष की ओर से वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर, धर्मजीत सिंह और अमर अग्रवाल ने सुशासन की सरकार के मंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया। अजय चंद्राकर ने कड़े लहजे में कहा कि यह जनहित से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है। उन्होंने मांग की कि मंत्री को तुरंत सदन में इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए ठोस घोषणा करनी चाहिए। जब स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि इसके लिए घोषणा की नहीं बल्कि नियम-निर्देशों की जरूरत है, तो अजय चंद्राकर भड़क गए। उन्होंने सवाल किया कि अगर निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए नियम हैं, तो उन्हें अब तक सदन के पटल पर क्यों नहीं रखा गया?
अपोलो बिलासपुर का मामला: सुशांत शुक्ला ने सात बार लिखा पत्र, फिर भी सुनवाई नहीं
बिलासपुर से विधायक सुशांत शुक्ला ने स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने सदन को बताया कि बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में आयुष्मान योजना की दिक्कतों को लेकर वे विभाग को अब तक सात बार पत्र लिख चुके हैं, लेकिन एक बार भी संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, विधायक आशाराम नेताम ने कहा कि ऐसा महसूस होता है कि स्वास्थ्य विभाग इस पूरी योजना को लेकर गंभीर ही नहीं है। विधायकों ने एक सुर में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की इस फ्लैगशिप योजना में कोताही बरतने वाले अधिकारियों पर गाज गिरनी चाहिए।
विधानसभा अध्यक्ष का हस्तक्षेप: मंत्री को जल्द निर्णय लेने के निर्देश
सदन में बढ़ते हंगामे और दोनों पक्षों के विधायकों की नाराजगी को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष (आसंदी) ने खुद मोर्चा संभाला। आसंदी ने कहा कि सदन का हर सदस्य, चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का, आयुष्मान योजना के सही क्रियान्वयन को लेकर चिंतित है। अध्यक्ष ने स्वास्थ्य मंत्री को निर्देशित किया कि वे विधायकों की भावनाओं को समझें और इस मामले में जल्द से जल्द कोई ठोस निर्णय लें। आसंदी के हस्तक्षेप के बाद मंत्री को जवाब देने के लिए विवश होना पड़ा।
स्वास्थ्य मंत्री का भरोसा: एक सप्ताह के भीतर होगी विभागीय समीक्षा
विधायकों के भारी दबाव के बाद स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल ने सदन को आश्वस्त किया कि वे इस मामले को प्राथमिकता पर लेंगे। मंत्री ने कहा कि सभी सदस्यों ने एक महत्वपूर्ण कमी की ओर ध्यान दिलाया है। उन्होंने घोषणा की कि अगले एक सप्ताह के भीतर वे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक लेंगे। इस बैठक में उन सभी अड़चनों को दूर किया जाएगा जिसकी वजह से मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है, ताकि प्रदेश के अधिक से अधिक निजी और सरकारी अस्पतालों में आयुष्मान योजना का लाभ पारदर्शी तरीके से मिल सके।
क्या सुधरेगी व्यवस्था? सात दिनों के डेडलाइन पर टिकी निगाहें
सदन में हुए इस हंगामे के बाद अब सबकी नजरें स्वास्थ्य विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं। विधायकों का आरोप है कि अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच तालमेल की कमी का खामियाजा गरीब जनता भुगत रही है। मंत्री द्वारा दी गई एक सप्ताह की समय-सीमा के बाद यह देखना होगा कि क्या वास्तव में अस्पतालों में कार्डधारियों को ‘कैशलेस’ इलाज मिलना शुरू होता है या यह केवल सदन की कार्यवाही तक ही सीमित रह जाएगा।



