
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में खरीफ फसल की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने वाले किसानों पर प्रशासन ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। शासन द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंध के बावजूद कई किसान रात के अंधेरे में चोरी-छिपे अपने खेतों के अवशेष जला रहे हैं। इस लापरवाही के कारण न केवल खेतों की मिट्टी खराब हो रही है, बल्कि आस-पास के घरों, सिंचाई पाइपों और कीमती कृषि उपकरणों के भी आग की चपेट में आने की खबरें मिल रही हैं। कृषि विभाग ने अब तक जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से पराली जलाने के 50 मामले दर्ज किए हैं।
छह महीने की जेल और 30 हजार तक का जुर्माना
नियमों का उल्लंघन करने वाले किसानों के खिलाफ धारा 188 के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की तैयारी है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर किसान को छह महीने तक की जेल की सजा हो सकती है। इसके अलावा, जमीन के क्षेत्रफल के आधार पर 2,500 रुपये से लेकर 30,000 रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि पराली जलाने वाले किसानों को भविष्य में सरकारी योजनाओं और सब्सिडी का लाभ लेने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान में ये सभी मामले धमतरी तहसील न्यायालय में सुनवाई के लिए लंबित हैं।
जंगल तक फैली लपटें, फायर ब्रिगेड ने पाया काबू
पराली की आग कितनी खतरनाक हो सकती है, इसका ताजा उदाहरण 11 फरवरी को सिहावा क्षेत्र में देखने को मिला। अंगिरा ऋषि पहाड़ी के पास एक किसान ने अपने खेत में आग लगाई थी, जो तेज हवाओं के कारण पास के गिधावा वन क्षेत्र तक फैल गई। इस घटना में लगभग 1.5 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ। इससे पहले हटकेशर क्षेत्र में भी आग ने पांच एकड़ में रखे पैरे (चारे) को राख कर दिया था और बोरिंग के पाइप व केबल जला दिए थे। फायर ब्रिगेड की टीम को आग बुझाने में करीब दो घंटे तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
मिट्टी की सेहत को हो रहा है बड़ा नुकसान
संबलपुर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शक्ति वर्मा के अनुसार, पराली जलाना सीधे तौर पर जमीन की उपजाऊ शक्ति को खत्म करना है। आग लगने से मिट्टी में मौजूद 16 प्रकार के जरूरी पोषक तत्व पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा, खेती के लिए मित्र कहे जाने वाले केंचुए और अन्य सूक्ष्मजीव भी जलकर मर जाते हैं। इसका सीधा असर पर्यावरण और आने वाली फसलों के उत्पादन पर पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक ऐसी क्षति है जिसे खाद डालकर तुरंत ठीक नहीं किया जा सकता।
जलाने के बजाय खाद बनाने की सलाह
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे पराली को जलाने के बजाय उसे खेत की जुताई कर मिट्टी में ही मिला दें। ऐसा करने से फसल के अवशेष कुछ ही समय में सड़कर जैविक खाद या कंपोस्ट का रूप ले लेते हैं। इससे न केवल मिट्टी की नमी धारण करने की क्षमता बढ़ती है, बल्कि अगली फसल में बीमारियां लगने का खतरा भी काफी कम हो जाता है। किसान चाहें तो इसका उपयोग गौशालाओं में चारे के रूप में भी कर सकते हैं, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ भी हो सकता है।
तहसील न्यायालय में शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया
कृषि विभाग के उपसंचालक मोनेश साहू ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण और सुरक्षा को देखते हुए खेतों में आग लगाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। विभाग की टीमों ने गांव-गांव जाकर साक्ष्य जुटाए हैं और अब तक 50 प्रकरण तैयार कर तहसील न्यायालय में पेश कर दिए गए हैं। आने वाले दिनों में इन किसानों पर भारी जुर्माने की वसूली शुरू की जाएगी। प्रशासन ने एक बार फिर किसानों से अपील 000की है कि वे अपनी और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पराली जलाने की आदत छोड़ें।



