
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में सुरक्षा बलों को अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी मिली है। केंद्र सरकार द्वारा नक्सलवाद उन्मूलन के लिए तय की गई 31 मार्च 2026 की समयसीमा से ठीक पहले माओवादी संगठन बिखरता नजर आ रहा है। बुधवार को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSJC) से जुड़े 44 महिलाओं समेत कुल 108 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया। इन माओवादियों पर सरकार ने कुल 3.29 करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। इस सामूहिक सरेंडर ने नक्सली खेमे में हड़कंप मचा दिया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा: इनाम और हथियारों की लंबी फेहरिस्त
बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर के ‘शौर्य भवन’ में डीजीपी अरुण देव गौतम ने इस ऐतिहासिक सफलता की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली न केवल हथियारों के साथ आए, बल्कि उन्होंने संगठन के गुप्त ठिकानों (डंप) की जानकारी भी साझा की। पुलिस और सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई में नक्सलियों के डंप से 101 घातक हथियार बरामद किए गए हैं, जिनमें एके-47, एलएमजी, इंसास और बीजीएल जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। यह बरामदगी नक्सलियों की सैन्य शक्ति पर एक बड़ा प्रहार है।
डंप से निकला कुबेर का खजाना: 3.61 करोड़ कैश और 1 किलो सोना बरामद
सुरक्षा बलों को तलाशी के दौरान माओवादियों के आर्थिक साम्राज्य की भी जानकारी मिली। एक बड़े डंप से पुलिस ने 3 करोड़ 61 लाख रुपये नकद बरामद किए हैं। इसके साथ ही करीब 1 किलो सोना भी मिला है, जिसकी बाजार में अनुमानित कीमत 1 करोड़ 64 लाख रुपये बताई जा रही है। माना जा रहा है कि यह पैसा और सोना लेवी वसूली और अवैध गतिविधियों के जरिए जमा किया गया था, जिसका इस्तेमाल नक्सली वारदातों को अंजाम देने और रसद जुटाने में किया जाता था।
बड़े चेहरों ने छोड़ा संगठन: जोनल कमेटी के दिग्गज भी मुख्यधारा में लौटे
सरेंडर करने वालों में केवल निचले स्तर के कैडर ही नहीं, बल्कि दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के कई ‘इनामी मास्टरमाइंड’ भी शामिल हैं। इनमें पश्चिम बस्तर डिवीजन के डीवीसीएम राहुल तेलाम, पंडरु कोवासी, झितरु ओयाम और पूर्व बस्तर डिवीजन के रामधर उर्फ बीरु जैसे खूंखार नाम हैं। पीएलजीए बटालियन नंबर-01 के सीपीसी कमांडर मुचाकी और आंध्र-ओडिशा बॉर्डर के डीवीसीएम कोसा मंडावी ने भी हथियार डाल दिए हैं। इन बड़े नेताओं के हटने से संगठन का सूचना तंत्र और रणनीतिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

‘पूना मारगेम’ का जादू: 26 महीनों में 2714 नक्सलियों का हृदय परिवर्तन
बस्तर पुलिस द्वारा चलाए जा रहे “पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” अभियान का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 26 महीनों में छत्तीसगढ़ में कुल 2714 माओवादियों ने मुख्यधारा का दामन थामा है। नक्सली अब यह समझने लगे हैं कि हिंसा से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत मिल रहे लाभ और सामान्य जीवन जीने की ललक ने उन्हें हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है।
बस्तर में सरेंडर का रिकॉर्ड: 2 साल में 2600 से ज्यादा ने छोड़ी बंदूक
आंकड़ों पर गौर करें तो 1 जनवरी 2024 से लेकर 9 मार्च 2026 तक अकेले बस्तर संभाग में 2625 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और अंदरूनी इलाकों में खुल रहे नए कैंपों (Forward Operating Bases) की वजह से नक्सलियों का आधार क्षेत्र सिमटता जा रहा है। अब नक्सली अपने ही गांवों में अलग-थलग पड़ रहे हैं, जिससे उनके पास सरेंडर करने या भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पड़ोसी राज्य ओडिशा में भी हड़कंप: 10 नक्सलियों ने डाले हथियार
नक्सल विरोधी अभियान का असर केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। ओडिशा के कंधमाल जिले में भी माओवादी संगठन को करारा झटका लगा है। वहां स्टेट कमेटी मेंबर सनू पोटाम उर्फ नीतू समेत 10 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। इन पर 1.65 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम था। दिलचस्प बात यह है कि ओडिशा में आत्मसमर्पण करने वाले ये नक्सली भी मूल रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर के रहने वाले हैं, जो पड़ोसी राज्यों में सक्रिय थे।
डेडलाइन के करीब सुरक्षा बल: 20 दिन में ‘लाल आतंक’ का अंतिम अध्याय?
केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इस डेडलाइन में अब केवल 20 दिन शेष हैं। 108 नक्सलियों का यह सामूहिक सरेंडर इस लक्ष्य की प्राप्ति की ओर एक निर्णायक कदम माना जा रहा है। सुरक्षा बलों का कहना है कि आने वाले दिनों में और भी बड़े सरेंडर या मुठभेड़ देखने को मिल सकती हैं, क्योंकि माओवादी संगठन अब अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है।



