
दंतेवाड़ा: बस्तर की जीवनरेखा मानी जाने वाली बैलाडिला की पहाड़ियों पर खनन विस्तार का विरोध एक बार फिर तेज हो गया है। दंतेवाड़ा जिले के स्थानीय युवाओं ने डिपॉजिट नंबर-4 को निजी हाथों में बेचने और वहां नई खदान खोलने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को सैकड़ों की संख्या में युवाओं ने विशाल बाइक रैली निकाली और कई किलोमीटर का दुर्गम रास्ता पैदल तय कर पहाड़ की चोटी पर पहुंचे। युवाओं का आरोप है कि सरकार और कंपनियां मुनाफे के लिए बस्तर की प्राकृतिक संपदा को नष्ट करने पर उतारू हैं। पहाड़ पर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की और साफ कर दिया कि वे अपनी जमीन पर किसी भी कीमत पर निजी कब्जा नहीं होने देंगे।
सियासी दलों का मिला बड़ा समर्थन: कांग्रेस से लेकर आप और सीपीआई तक आए एक मंच पर
युवाओं के इस स्वस्फूर्त आंदोलन को बस्तर के विभिन्न राजनीतिक दलों का भी साथ मिल रहा है। इस प्रदर्शन में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और सीपीआई (CPI) के नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए। कांग्रेस नेता छविंद्र कर्मा ने आंदोलन को संबोधित करते हुए कहा कि ये पहाड़ और जंगल बस्तर के अस्तित्व के लिए जरूरी हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यह लड़ाई केवल खदान नंबर-4 तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एनएमडीसी-एनसीएल के खिलाफ खदान क्रमांक 13 तक जारी रखी जाएगी। राजनीतिक दलों के जुड़ने से अब यह मुद्दा केवल स्थानीय विरोध न रहकर एक बड़ा क्षेत्रीय आंदोलन बनता जा रहा है।

पर्यावरण और वन्यजीवों पर संकट: दुर्लभ जीवों का आशियाना उजाड़ने की साजिश का आरोप
आंदोलनकारियों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि खनन को आसान बनाने के लिए जानबूझकर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जा रही है। पर्यावरण प्रेमी राहुल महाजन ने तर्क दिया कि यह पूरा इलाका कई दुर्लभ जीव-जंतुओं का घर है और यहीं से बस्तर को शुद्ध ऑक्सीजन मिलती है।
- अभ्यारण्य का मुद्दा: प्रदर्शनकारियों का दावा है कि साजिश के तहत इस क्षेत्र को भैरमगढ़ अभ्यारण्य की सीमा से बाहर रखा गया है ताकि खनन में कोई कानूनी अड़चन न आए।
- जैव विविधता: जंगल में कई जंगली जानवर विचरण के लिए आते हैं, जिनके प्राकृतिक रास्ते खदान बनने से बंद हो जाएंगे।
- पारिस्थितिक नुकसान: पहाड़ों की खुदाई से स्थानीय जल स्रोतों और मिट्टी की उर्वरता पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है।
‘डिपॉजिट-4’ को बचाने के लिए आर-पार की जंग का ऐलान
स्थानीय युवाओं और राजनीतिक दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और उग्र होगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे पहाड़ की पारिस्थितिकी (Ecology) और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। वन विभाग और प्रशासन की टीम फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है, लेकिन प्रदर्शनकारियों की एकजुटता ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। बस्तर के इस संवेदनशील इलाके में खनन और पर्यावरण के बीच छिड़ी यह जंग अब सीधे तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ जन-आक्रोश का रूप ले चुकी है।



