
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में मंगलवार को विज्ञापनों के नाम पर सरकारी खजाने से हुए भुगतान का मामला गरमा गया। भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला के एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सदन को बताया कि पिछली सरकार के दौरान नेशनल हेराल्ड और संडे नवजीवन जैसे प्रकाशनों को करोड़ों रुपये के विज्ञापन जारी किए गए थे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अकेले नेशनल हेराल्ड को पांच साल की अवधि में 4.24 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। इस खुलासे के बाद सत्ता पक्ष ने पिछली सरकार की विज्ञापन नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं और जांच की मांग तेज हो गई है।
पांच सालों में बढ़ा ग्राफ: 34 लाख से 1.36 करोड़ तक पहुंचा आंकड़ा
मुख्यमंत्री ने सदन में सालवार आंकड़ों का ब्यौरा पेश करते हुए बताया कि नेशनल हेराल्ड को मिलने वाली राशि हर साल बढ़ती गई। साल 2019-20 में जहां 34 लाख रुपये दिए गए, वहीं 2023-24 तक यह राशि बढ़कर 1.36 करोड़ रुपये सालाना हो गई। आंकड़ों के मुताबिक, 2020-21 में 58 लाख, 2021-22 में 68 लाख और 2022-23 में 1.28 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। हालांकि, वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल यानी 2024 से 2026 के बीच इन संस्थानों को कोई भी राशि जारी नहीं की गई है।
संडे नवजीवन को भी मिले 3 करोड़: विज्ञापनों की दर पर उठे सवाल
चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि केवल नेशनल हेराल्ड ही नहीं, बल्कि संडे नवजीवन को भी विज्ञापन मद से 3 करोड़ 6 लाख रुपये का भारी-भरकम भुगतान किया गया है। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने विज्ञापन की दरों पर आपत्ति जताते हुए पूछा कि आखिर किस आधार पर इतनी बड़ी रकम बांटी गई। मुख्यमंत्री ने बताया कि यह विज्ञापन 8 लाख रुपये प्रति पृष्ठ की ऊंची दर पर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि इसके लिए विज्ञापन नियमावली 2019 को आधार बनाया गया था, जिसकी अब समीक्षा की जा सकती है।
राजनीतिक मुखपत्र को सरकारी पैसा: जांच के घेरे में पिछली सरकार
सदन में पूरक प्रश्न पूछते हुए विधायकों ने इस बात पर जोर दिया कि क्या सरकार किसी विशेष राजनीतिक दल की विचारधारा से जुड़े मुखपत्रों को जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा दे सकती है। मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि नेशनल हेराल्ड के प्रबंधकर्ता पवन बंसल हैं और इसके असली मुखिया कौन हैं, यह पूरा देश जानता है। सत्ता पक्ष के सदस्यों ने सवाल उठाया कि क्या उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने इन विज्ञापनों को मंजूरी दी थी। भाजपा विधायकों ने इसे सीधे तौर पर सरकारी धन का दुरुपयोग करार दिया है।
संचालन और कार्यालय पर संशय: कहां से छपते थे ये अखबार?
विधायक सुशांत शुक्ला ने सरकार से इन संस्थानों के कार्यालयों के पते और उनके संचालन के स्थान की भी जानकारी मांगी थी। विपक्ष का आरोप है कि जिन समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को करोड़ों रुपये दिए गए, उनका राज्य में प्रसार न के बराबर था। चर्चा के दौरान यह संकेत मिले कि विज्ञापन देते समय प्रकाशनों की पाठक संख्या और प्रभाव की अनदेखी की गई। मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि विज्ञापनों के वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए नियमों का कड़ाई से पालन किया जाएगा और पुरानी अनियमितताओं की जांच पर विचार हो सकता है।
सदन में तीखी नोकझोंक: भ्रष्टाचार के आरोपों से गरमाया माहौल
विज्ञापनों के इस खेल पर चर्चा के दौरान सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। भाजपा सदस्यों ने इसे पिछली सरकार का “उपहार मॉडल” बताया, जबकि कांग्रेस के सदस्यों ने अपनी नीतियों का बचाव करने की कोशिश की। मुख्यमंत्री के जवाबों ने यह साफ कर दिया है कि वर्तमान सरकार विज्ञापनों के पुराने रिकॉर्ड खंगालने के मूड में है। इस खुलासे के बाद अब प्रदेश की राजनीति में विज्ञापनों के जरिए राजनीतिक लाभ पहुंचाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।



