
छत्तीसगढ़ में लंबे समय से नियमितीकरण की राह देख रहे संविदा कर्मचारियों के लिए हाईकोर्ट से एक राहत भरी खबर आई है। अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें नियमित नियुक्ति देने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति एके प्रसाद की एकलपीठ के इस निर्णय को प्रदेश के हजारों संविदा कर्मियों के लिए एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इस फैसले का असर आने वाले समय में अन्य सरकारी विभागों में चल रही कानूनी लड़ाइयों पर भी पड़ सकता है।
राज्य सरकार के 2022 के आदेश को कोर्ट ने किया रद्द
यह पूरा विवाद याचिकाकर्ता हंस कुमार रजवाड़े और जय प्रकाश चौहान द्वारा दायर की गई याचिका से शुरू हुआ था। इन कर्मचारियों ने साल 2022 में जारी उस सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विभाग ने उनकी सेवाओं को नियमित मानने से साफ इनकार कर दिया था। सरकार का तर्क था कि इनकी नियुक्ति संविदा के आधार पर हुई थी, इसलिए इन्हें नियमित कर्मचारियों वाले लाभ नहीं दिए जा सकते। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए सरकार के उस पुराने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
नियमित पदों पर संविदा नियुक्ति को कोर्ट ने माना गलत
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार को एक ‘आदर्श नियोक्ता’ की जिम्मेदारी याद दिलाई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई पद पहले से ही नियमित प्रकृति का और स्वीकृत है, तो सरकार केवल विज्ञापन में ‘संविदा’ शब्द लिखकर कर्मचारियों को उनके वाजिब हक से वंचित नहीं कर सकती। फैसले में साफ किया गया कि सरकार का दायित्व अपने कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष और समान व्यवहार करना है, चाहे भर्ती का तरीका कुछ भी रहा हो।
2012 के विज्ञापन और चयन प्रक्रिया का पूरा गणित
मामले की जड़ें साल 2012 में जारी एक संयुक्त विज्ञापन में छिपी हैं। उस वक्त स्कूल शिक्षा विभाग ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए आवेदन मंगाए थे, जिनमें डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद भी शामिल थे। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि बीईओ कार्यालयों के लिए ये पद पहले से ही नियमित तौर पर मंजूर थे। साथ ही, साल 2007 में सीधी भर्ती पर लगी रोक भी विज्ञापन जारी होने तक हट चुकी थी, जिससे नियमित नियुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ था।
परिवीक्षा अवधि ने मजबूत किया कर्मचारियों का दावा
कर्मचारियों के पक्ष में सबसे मजबूत कड़ी उनके नियुक्ति पत्र में लिखी ‘परिवीक्षा अवधि’ (Probation Period) की शर्त बनी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उनकी नियुक्ति के समय दो साल की परिवीक्षा अवधि का प्रावधान रखा गया था, जो आमतौर पर केवल नियमित सरकारी भर्तियों में ही होता है। लगभग दस साल तक निरंतर सेवा देने के बाद भी जब उन्हें नियमित नहीं किया गया, तब उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया संविदा के बजाय नियमित भर्ती के मानकों के अधिक करीब थी।
भविष्य के लिए मिसाल बनेगा हाईकोर्ट का यह निर्देश
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब स्कूल शिक्षा विभाग को इन दोनों ऑपरेटरों को स्वीकृत नियमित पदों पर ज्वाइनिंग देनी होगी। इस निर्णय ने उन संविदा कर्मचारियों के बीच नई ऊर्जा भर दी है जो समान काम के बावजूद नियमित लाभों से दूर हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश भविष्य में उन सभी मामलों के लिए आधार बनेगा जहां पद नियमित होने के बावजूद कर्मचारियों को संविदा के नाम पर कम वेतन या सीमित सुविधाओं में रखा गया है।



