
बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सारंगढ़ नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष सोनी अजय बंजारे के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने उन्हें पद से हटाने और भविष्य के लिए अयोग्य ठहराने के राज्य सरकार के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि को हटाना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है और इसमें नियमों का पालन अनिवार्य है।
जमीन आवंटन से शुरू हुआ था विवाद
पूरा मामला सारंगढ़ नगर पालिका क्षेत्र के भीतर परिषद की जमीन के कुछ हिस्सों को निजी व्यक्तियों को लीज पर देने से जुड़ा था। सोनी बंजारे ने जनवरी 2022 में अध्यक्ष का पद संभाला था, जिसके बाद दुकानों के विस्तार के लिए प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल के प्रस्तावों के जरिए जमीन आवंटित की गई थी। हालांकि, शिकायत में यह आरोप लगाया गया था कि राज्य सरकार की अंतिम मंजूरी मिलने से पहले ही लाभार्थियों को जमीन का कब्जा सौंप दिया गया, जो नियमों का उल्लंघन था।
सरकार ने जनहित का हवाला देकर की थी कार्रवाई
इस मामले की जांच के बाद राज्य सरकार ने 2 जुलाई 2025 को एक कड़ा आदेश जारी किया था। सरकार का मानना था कि सोनी बंजारे का अध्यक्ष पद पर बने रहना जनहित में नहीं है क्योंकि उन्होंने कानूनी प्रक्रिया और सक्षम अधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना काम किया। छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए का उपयोग करते हुए सरकार ने उन्हें न केवल पद से हटाया, बल्कि अगले कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य भी घोषित कर दिया था।
प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सरकार की कार्रवाई पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि धारा 41-ए के तहत शक्ति का उपयोग करते समय ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों का सख्ती से पालन होना चाहिए। अदालत ने माना कि निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाना एक गंभीर कदम है, जिसे बिना ठोस आधार और निष्पक्ष सुनवाई के अंजाम नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक चूक को आधार बनाकर सीधे बर्खास्तगी करना न्यायसंगत नहीं है।
एकल पीठ का फैसला डिवीजन बेंच में पलटा
इससे पहले, सोनी बंजारे ने सरकार के आदेश को एकल पीठ (Single Bench) में चुनौती दी थी, लेकिन वहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी और सरकारी आदेश को सही ठहराया गया था। इसके बाद उन्होंने हार न मानते हुए डिवीजन बेंच में अपील दायर की। अब खंडपीठ के ताजा फैसले ने एकल पीठ के आदेश को भी पलट दिया है, जिससे सोनी बंजारे की राजनीतिक वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
प्रशासनिक और कानूनी दांव-पेच की हार
अदालत के इस फैसले को प्रशासन और सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक नजीर साबित होगा। हाई कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि निर्वाचित पदों पर बैठे व्यक्तियों को हटाने के लिए केवल प्रशासनिक राय काफी नहीं है, बल्कि उसके पीछे मजबूत कानूनी साक्ष्य और निष्पक्ष प्रक्रिया का होना अनिवार्य है।



