
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जो सत्ता से दूर होकर भी केंद्र में बने रहते हैं। डॉ. रमन सिंह ऐसा ही नाम हैं एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने मुख्यमंत्री, कार्यकर्ता और अब विधानसभा अध्यक्ष तक की यात्रा में हर भूमिका को मर्यादा के साथ निभाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में उनकी तुलना क्रिकेट के ‘कैप्टन से खिलाड़ी’ बनने वाले रूपक से की, जो केवल प्रशंसा नहीं बल्कि संयमित नेतृत्व शैली की मान्यता भी है।
मुख्यमंत्री से विधानसभा अध्यक्ष तक की सधी हुई यात्रा
छत्तीसगढ़ के 25 साल के राजनीतिक सफर में रमन सिंह की भूमिका रीढ़ की तरह रही है। पंद्रह वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने सत्ता में रहते हुए भी अहंकार को खुद से दूर रखा। 2018 में भाजपा के सत्ता से बाहर होने के बाद भी उन्होंने संयम और आत्ममंथन का रास्ता चुना। यही गुण उन्हें राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखता है।
पराजय में भी नहीं डगमगाया धैर्य
अक्सर देखा गया है कि सत्ता खोने के बाद नेता हाशिए पर चले जाते हैं, पर रमन सिंह ने हार को अवसर में बदला। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर यह जताया कि संगठन के प्रति उनका समर्पण पद से ऊपर है। भाजपा के सत्ता में लौटने के बाद भी उन्होंने मुख्यमंत्री पद न मिलने पर संतुलन और मर्यादा बनाए रखी यही उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाता है।
“सत्ता में संयम, सत्ता से बाहर संतुलन”
विधानसभा अध्यक्ष के रूप में रमन सिंह अब राज्य की संवैधानिक गरिमा के संरक्षक हैं। वे सदन की मर्यादा और संवाद की परंपरा को सशक्त कर रहे हैं। उनकी भाषा और व्यवहार यह सिखाते हैं कि लोकतंत्र में संवाद विरोध से बड़ा होता है।
‘कैप्टन से खिलाड़ी’ राजनीति में दुर्लभ मिसाल
प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि “कैप्टन अब खिलाड़ी बन गया” केवल एक रूपक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश है। क्रिकेट में कप्तान आगे चलकर खिलाड़ी बनता है, पर राजनीति में यह विरल है। रमन सिंह ने दिखाया कि नेतृत्व का अर्थ पद नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण है। उन्होंने यह साबित किया कि राजनीति में प्रतिष्ठा त्याग और सादगी से अर्जित होती है।
जनता से गहराई तक जुड़ा व्यक्तित्व
छत्तीसगढ़ की जनता आज भी उन्हें ‘डॉ. साहब’ कहकर आदर देती है, क्योंकि उनकी राजनीति की जड़ें गांवों की मिट्टी में हैं। डॉक्टर से लेकर मुख्यमंत्री और अब विधानसभा अध्यक्ष बनने तक उन्होंने अपनी पहचान का ‘जनपक्ष’ कभी नहीं छोड़ा। यही कारण है कि वे आज भी ‘विनम्रता के प्रतीक’ और ‘शांत चेहरे’ के रूप में देखे जाते हैं।
संयमित सियासत की मिसाल
आज की राजनीति जहां शोर, तंज और ट्रोलिंग से भरी है, वहाँ रमन सिंह की भाषा अब भी संयमित और सुसंस्कृत है। वे विरोधियों से बहस करते हैं लेकिन वैमनस्य नहीं रखते। यह उनके राजनीतिक संस्कार का परिणाम है। आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी की राजनीति के बीच उनका अनुभव मार्गदर्शक की तरह रहेगा।
सत्ता से बड़ा ‘सेवा’ और पद से बड़ा ‘प्रेरणा’
छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा दरअसल उस राजनीतिक संस्कृति की मान्यता है जिसमें त्याग और अनुशासन सर्वोपरि हैं। डॉ. रमन सिंह ने यह दिखाया है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो सत्ता से दूर होकर भी सम्मान का केंद्र बना रहे। वे अब केवल भाजपा या विधानसभा के नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सियासत की संवेदनशील आत्मा बन चुके हैं — राजनीति के टीम स्पिरिट का जीवंत प्रतीक।
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