
रायपुर के रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई तीन मजदूरों की मौत ने अब तूल पकड़ लिया है। घटना को 24 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका है लेकिन पुलिस ने अब तक इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की है। जब मामला दर्ज ही नहीं हुआ तो किसी की गिरफ्तारी का सवाल भी नहीं उठता। इसे लेकर शहर में भारी आक्रोश है। मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मजदूरों को बिना सुरक्षा के गटर में उतारना हत्या जैसा अपराध है।
रात के अंधेरे में अस्पताल से ‘गायब’ कर दी गईं लाशें
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शवों को शिफ्ट करने के तरीके पर उठ रहा है। नियमानुसार किसी भी हादसे में मौत होने पर पुलिस को पंचनामा करना होता है और अपनी कस्टडी में शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजना होता है। लेकिन आरोप है कि रामकृष्ण केयर अस्पताल के कर्मचारियों ने अपनी वैन में शवों को भरकर रात के अंधेरे में ही वहां से हटा दिया। सुबह ये लाशें पोस्टमार्टम केंद्र में मिलीं। परिजनों का सवाल है कि क्या पुलिस को इस बात की जानकारी थी? अगर पुलिस को बिना बताए शव हटाए गए तो अस्पताल पर एक्शन क्यों नहीं हुआ?
पुलिस की चुप्पी और ‘सेटिंग’ के लग रहे गंभीर आरोप
टिकरापारा थाना पुलिस की कार्यप्रणाली इस वक्त सवालों के घेरे में है। घटना के इतने घंटे बीत जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज न होना कई तरह के संदेह पैदा कर रहा है। चर्चा यह भी है कि मामले को मुआवजे की रकम देकर दबाने की कोशिश की जा रही है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या पुलिस और अस्पताल प्रबंधन के बीच कोई मिलीभगत है? आखिर किसके कहने पर सबूतों के साथ खिलवाड़ करते हुए शवों को पीछे के गेट से चुपचाप बाहर निकाला गया?
अशोका बिरयानी कांड जैसा गुस्सा, पर जनप्रतिनिधि नदारद
इस हादसे की तुलना कुछ समय पहले हुए अशोका बिरयानी गटर कांड से की जा रही है। उस समय दो मजदूरों की मौत पर गृह मंत्री विजय शर्मा खुद आधी रात को मौके पर पहुंचे थे और तुरंत एफआईआर दर्ज कर दोषियों को जेल भेजा गया था। लेकिन रामकृष्ण हॉस्पिटल वाले मामले में तीन मौतें होने के बाद भी अब तक कोई बड़ा नेता या जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवारों का हाल जानने नहीं पहुंचा। इस भेदभाव को लेकर लोगों में काफी नाराजगी है।
कांग्रेस ने बोला हमला, कहा- मामले की हो रही लीपापोती
कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने इस पूरे प्रकरण पर सरकार और प्रशासन को घेरा है। उन्होंने आरोप लगाया कि रसूखदार अस्पताल प्रबंधन को बचाने के लिए मामले में लीपापोती की जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ये मजदूर किसी ठेकेदार के थे या सीधे अस्पताल से जुड़े थे? इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कांग्रेस ने मांग की है कि दोषियों पर तत्काल गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
नियमों की अनदेखी बनी मजदूरों की मौत का कारण
सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए इंसान को अंदर उतारना कानूनन मना है। इसके लिए मशीनों का इस्तेमाल अनिवार्य है। जानकारों का कहना है कि टैंक के अंदर बनी जहरीली गैस पल भर में जान ले लेती है। अगर मजदूरों को सुरक्षा किट और ऑक्सीजन मास्क दिए जाते तो शायद आज वे जिंदा होते। अस्पताल प्रबंधन ने सुरक्षा के बजाय खर्च बचाने को ज्यादा अहमियत दी जिसका नतीजा इन तीन घरों के चिराग बुझने के रूप में सामने आया है।
इंसाफ की गुहार लगा रहे परिजन, अस्पताल बंद करने की मांग
मृतक मजदूरों के परिजन इस वक्त अस्पताल के बाहर डटे हुए हैं। उनकी मांग है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और अस्पताल मालिकों की गिरफ्तारी नहीं होती वे पीछे नहीं हटेंगे। परिजनों ने मांग की है कि ऐसे लापरवाह अस्पताल को तुरंत सील कर देना चाहिए। फिलहाल इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस बल तैनात है लेकिन अब तक किसी भी ठोस कार्रवाई का न होना प्रशासन की मंशा पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।



