
बिलासपुर हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो बाद में रिश्ता टूटने या शादी न होने पर इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता। जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि एक रिश्ता आखिरकार खराब हो गया या खत्म हो गया, उसे कानूनी रूप से अपराध के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
15 साल पुराने संबंधों का था मामला
यह पूरा मामला भिलाई की एक महिला से जुड़ा है जिसने साल 2020 में एक युवक के खिलाफ शादी का झांसा देकर दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि आरोपी साल 2005 से उसके साथ शारीरिक संबंध बना रहा है। पुलिस ने मामले में धारा 376 और 506 के तहत केस दर्ज किया था। बाद में इसमें एट्रोसिटी एक्ट (SC/ST Act) की धाराएं भी जोड़ी गई थीं। निचली अदालत द्वारा चार्ज फ्रेम किए जाने के बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की थी।
शिकायत दर्ज कराने में देरी पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने पाया कि महिला और पुरुष करीब 15 साल तक रिलेशनशिप में थे। इस लंबे समय के दौरान महिला ने कई बार अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाए और आरोपी के साथ समय बिताया। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि इतने वर्षों में पीड़िता ने कभी भी किसी पुलिस स्टेशन या सरकारी अथॉरिटी में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। इतने लंबे समय तक खामोश रहना और बार-बार मिलना यह दर्शाता है कि रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित था।
शादी का झूठा वादा और कानून की स्थिति
अदालत ने दलीलों को सुनने के बाद कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा या धोखेबाजी की नीयत से किया गया था। कानून के मुताबिक ‘धोखे से ली गई सहमति’ और ‘वादा पूरा न कर पाने’ के बीच एक बारीक अंतर होता है। इस मामले में पीड़िता को आरोपी की शादीशुदा स्थिति और जातिगत बाधाओं के बारे में पहले से पता था, फिर भी उसने रिश्ता जारी रखा।
सामाजिक रुकावटों की जानकारी थी पीड़िता को
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि महिला को दोनों के बीच जाति के अंतर और पुरुष की निजी परिस्थितियों के बारे में पूरी जानकारी थी। इन सामाजिक अड़चनों को जानते हुए भी इतने सालों तक संबंध बनाए रखना यह साबित करता है कि महिला अपनी मर्जी से इस रिश्ते का हिस्सा थी। कोर्ट ने माना कि यह मामला आपसी समझ का है, न कि किसी प्रारंभिक धोखे का, जिसके आधार पर रेप की धाराएं लगाई जा सकें।
कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखी जाती है, तो यह कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने माना कि लंबे समय के सहमति वाले संबंधों को बलात्कार का रूप देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। आरोपी के विरुद्ध जारी आरोप पत्र (Charge Sheet) को खारिज करते हुए कोर्ट ने उसे बड़ी राहत दी और मामले को पूरी तरह बंद करने का आदेश दिया।
बालिगों के लिए कानून के मायने
इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि कानून दो वयस्कों के निजी फैसलों में तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई स्पष्ट अपराध हुआ हो। सहमति से बने संबंधों में भावनात्मक दरार आने पर आपराधिक धाराओं का इस्तेमाल करना न्यायोचित नहीं है। जस्टिस वर्मा की कोर्ट ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध निचली अदालत में चल रही सभी कानूनी प्रक्रियाओं को निरस्त कर दिया है।



