
रायपुर: छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग में एक बड़ा ‘टेंडर खेल’ सामने आया है। विभाग की महत्वपूर्ण ‘सुचिता योजना’ के तहत छात्राओं के लिए सेनेटरी पैड की खरीदी में नियमों को ताक पर रख दिया गया। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, करोड़ों रुपये के पैड्स की सप्लाई का जिम्मा किसी मेडिकल एक्सपर्ट या हाइजीन उत्पाद निर्माता को नहीं, बल्कि कोरिया की एक ऐसी फर्म को दिया गया है जो फर्नीचर बनाने का काम करती है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि भंडार क्रय नियम 2022 और संशोधित नियम 2025 के अनिवार्य निर्देशों के बावजूद, इस खरीदी के लिए न तो जेम (GeM) पोर्टल का सहारा लिया गया और न ही कोई ऑनलाइन निविदा (Tender) आमंत्रित की गई।

35 लाख पैड्स का बड़ा सौदा: 350 सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में होनी है सप्लाई
विभाग द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, प्रदेश के 350 चिन्हित स्कूलों और कॉलेजों में सेनेटरी नैपकिन की आपूर्ति की जानी है। इस डील की बारीकियां कुछ इस प्रकार हैं:
- कुल मात्रा: 35,00,000 (35 लाख) यूनिट पैड्स।
- तय दर: 3.25 रुपये प्रति पैड।
- कुल बजट: लगभग 1 करोड़ 13 लाख 75 हजार रुपये।इतनी बड़ी राशि का भुगतान बिना किसी पारदर्शी प्रतिस्पर्धा के एक फर्नीचर वेंडर को करना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
फर्नीचर वेंडर और सेनेटरी पैड: क्या बिना अनुभव के ही दे दिया गया हाइजीन प्रोडक्ट्स का काम?
आमतौर पर स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े उत्पादों की खरीदी के लिए कंपनी की तकनीकी योग्यता और पुराने अनुभव की जांच की जाती है। लेकिन इस मामले में जिस फर्म को चुना गया है, उसका प्राथमिक काम फर्नीचर निर्माण है। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग ने यह जांचने की जहमत उठाई कि एक फर्नीचर बनाने वाली कंपनी के पास मेडिकल ग्रेड के सेनेटरी उत्पाद बनाने या सप्लाई करने की तकनीकी क्षमता है भी या नहीं?

नियमों का खुला उल्लंघन: 90 दिन की समय सीमा और वित्तीय अनुमति का क्या हुआ?
जानकारों का कहना है कि नियमों के अनुसार, टेंडर की प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी न होने पर वह स्वतः निरस्त हो जाती है। यदि विभाग नए सिरे से टेंडर नहीं निकालता और ऑफलाइन प्रक्रिया अपनाता है, तो इसके लिए शासन से अलग से ‘वित्तीय सहमति’ (Financial Sanction) लेना अनिवार्य होता है। इस मामले में विभाग के पास ऐसी किसी नई वित्तीय अनुमति के दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, जो पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है।
विभाग का गोलमोल जवाब: ‘एल-1’ कंपनी के पीछे हटने के बाद फर्नीचर फर्म को थमाया काम
जब इस पूरे मामले पर विभाग से जवाब मांगा गया, तो अधिकारियों ने बताया कि जनवरी-फरवरी 2025 में जेम पोर्टल पर टेंडर निकाला गया था। उनके अनुसार, जिस कंपनी को सबसे कम रेट (L-1) पर काम मिला था, उसने सप्लाई करने से मना कर दिया। इसके बाद विभाग ने कार्रवाई करते हुए फर्नीचर फर्म का चयन किया। हालांकि, विभाग यह साफ नहीं कर पाया कि एक साल पुराने टेंडर के आधार पर अब ऑफलाइन ऑर्डर कैसे जारी कर दिया गया।
ट्रांसफर की जल्दबाजी या अधिकारियों की मिलीभगत? बिना वित्तीय अनुमति के लिया गया फैसला
सचिवालय के गलियारों में चर्चा है कि यह निर्णय किसी बड़े अधिकारी के ट्रांसफर के ठीक पहले जल्दबाजी में लिया गया हो सकता है। बिना किसी नई वित्तीय अनुमति के करोड़ों का भुगतान करने की तैयारी यह दर्शाती है कि विभाग के भीतर नियमों की व्याख्या अपनी सुविधा के अनुसार की जा रही है। क्या यह किसी खास वेंडर को लाभ पहुंचाने के लिए अपनाई गई रणनीति है?

सुलगते सवाल जिनका जवाब अब तक नहीं मिला
इस पूरे प्रकरण ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब संचालक या जिम्मेदार अधिकारियों के पास नहीं है:
- बिना टेंडर प्रक्रिया अपनाए सीधे कार्यादेश (Work Order) क्यों जारी हुआ?
- क्या 1.13 करोड़ के भुगतान के लिए शासन से लिखित वित्तीय अनुमति ली गई?
- फर्नीचर बनाने वाली कंपनी की क्वालिटी रिपोर्ट और लैब टेस्टिंग का आधार क्या है?
- क्या इस लापरवाही के लिए विभाग का कोई शीर्ष अधिकारी जिम्मेदार है?

पारदर्शिता पर भारी पड़ता ‘अपनापन’: अनुभव पर भारी पड़ा रसूख?
इस मामले से एक बात तो साफ है कि यदि विभाग में अधिकारियों से संबंध अच्छे हों, तो अनुभव और नियम गौण हो जाते हैं। एक फर्नीचर वेंडर का स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश करना यह बताता है कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी पलीता लगा रहे हैं। सरकार की मंशा छात्राओं को सुविधा देने की है, लेकिन विभाग की कार्यप्रणाली इस अच्छी मंशा पर दाग लगा रही है।
निरंतर जारी है ‘टेंडर का खेल’: शासन की सख्ती के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं
छत्तीसगढ़ सरकार ने कई विभागों में गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की है, लेकिन ‘नैपकिन नेक्सस’ जैसे मामले बताते हैं कि भ्रष्टाचार के रास्ते अब भी खुले हैं। जब तक ऑफलाइन टेंडर और बिना अनुभव वाली कंपनियों को काम देने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगेगा, तब तक सरकारी खजाने को इसी तरह चूना लगता रहेगा। अब देखना होगा कि शासन इस मामले में दोषियों पर क्या कार्रवाई करता है।
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