
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और गुजारा भत्ता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई महिला अपने पहले पति को कानूनी तौर पर तलाक दिए बिना दूसरी शादी करती है, तो वह दूसरे पति से गुजारा भत्ता (Maintenance) पाने की हकदार नहीं होगी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने दुर्ग-भिलाई की एक महिला की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए किया गया दूसरा विवाह कानून की नजर में शून्य है।
दूसरे पति से मांगे थे हर महीने 1 लाख रुपये
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब महिला ने अपने दूसरे पति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन दिया। महिला का दावा था कि उसकी शादी जुलाई 2020 में आर्य समाज मंदिर में हुई थी। उसने अपने पति पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए घर से निकालने की बात कही थी। महिला ने अपने पति की मासिक आय 5 लाख रुपये बताते हुए खुद के लिए हर महीने 1 लाख रुपये के गुजारे भत्ते की मांग की थी।
सुनवाई में खुला राज: महिला का पहला पति है जीवित
जब मामला अदालत में चला, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सुनवाई के दौरान पता चला कि महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका पहला पति न केवल जीवित है, बल्कि महिला ने उससे कानूनी तौर पर तलाक भी नहीं लिया था। प्रति-परीक्षण के दौरान महिला ने खुद स्वीकार किया कि पहली शादी से उसके दो बालिग बेटे हैं जो उसी के साथ रहते हैं। इस खुलासे के बाद महिला का दावा कानूनी रूप से कमजोर पड़ गया।
फैमिली कोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी थी अर्जी
हाईकोर्ट पहुंचने से पहले यह मामला फैमिली कोर्ट में था। वहां अदालत ने पाया कि महिला ने दूसरी शादी के समय खुद को अविवाहित बताया था। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला पहले आशा वर्कर के रूप में काम कर चुकी है और वह शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है। यानी वह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। इन्ही आधारों पर 20 जनवरी 2026 को फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: तलाक के बिना दूसरी शादी गलत
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई तकनीकी खामी नहीं है। बिना तलाक लिए दूसरी शादी करना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अवैध है। जब शादी ही कानूनी रूप से मान्य नहीं है, तो उसके आधार पर भरण-पोषण की मांग करना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
सीआरपीसी धारा 125 का असली उद्देश्य
अदालत ने अपने फैसले में कानून की मूल भावना को भी स्पष्ट किया। सीआरपीसी की धारा 125 का मुख्य उद्देश्य उन पत्नियों, बच्चों या माता-पिता की मदद करना है जिन्हें बेसहारा छोड़ दिया गया है। लेकिन इसके लिए एक वैध कानूनी रिश्ता होना अनिवार्य है। अगर रिश्ते की बुनियाद ही कानूनी प्रक्रिया (जैसे तलाक) का उल्लंघन कर रखी गई है, तो कानून ऐसे दावों को स्वीकार नहीं करता है।
हिंदू विवाह अधिनियम और अवैध संबंधों का असर
हिंदू कानून के मुताबिक, एक जीवित जीवनसाथी के रहते हुए दूसरा विवाह करना ‘बाइगेमी’ (द्विविवाह) की श्रेणी में आता है, जो दंडनीय अपराध है। ऐसे विवाह से जुड़े किसी भी अधिकार का दावा कोर्ट में नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि वैवाहिक अधिकारों का लाभ लेने के लिए कानूनी नियमों का पालन करना कितना जरूरी है। अवैध विवाह के आधार पर भरण-पोषण की मांग को कोर्ट ने पूरी तरह अनुचित माना है।
अपनी आजीविका चलाने में सक्षम है महिला
कोर्ट ने फैसले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान दिया। गुजारा भत्ता उन मामलों में दिया जाता है जहां आवेदक खुद की देखभाल करने में असमर्थ हो। इस केस में महिला न केवल काम करने के योग्य थी, बल्कि पूर्व में रोजगार से भी जुड़ी रही थी। कोर्ट ने माना कि उसके पास आय के साधन जुटाने की क्षमता है, इसलिए भी वह दूसरे व्यक्ति पर आर्थिक रूप से निर्भर होने का कानूनी दावा नहीं कर सकती।
समाज और कानून के लिए एक नजीर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय वैवाहिक अनुशासन और जागरूकता की दिशा में एक नजीर साबित होगा। यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो कानूनी औपचारिकताओं को नजरअंदाज कर दूसरी शादियां कर लेते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून केवल उन्हीं अधिकारों की रक्षा करता है जो कानूनी प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर बनाए गए हों। अब इस आदेश के बाद यह तय हो गया है कि बिना तलाक के दूसरी शादी करने वालों को भरण-पोषण का लाभ नहीं मिलेगा।



