
संसद के बजट सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने अभिभाषण में छत्तीसगढ़ के बदलते हालातों का विशेष जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बस्तर और आसपास के इलाकों में अब आतंक की जगह विकास ले रहा है। राष्ट्रपति ने एक भावनात्मक उदाहरण देते हुए बताया कि बीजापुर के एक अंदरूनी गांव में जब 25 साल बाद बस पहुंची, तो ग्रामीणों ने उसे किसी बड़े त्यौहार की तरह मनाया। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि सुरक्षा बलों की सख्ती और सरकार की नीतियों के कारण अब विकास का पहिया उन इलाकों तक भी पहुंच रहा है जहां कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था।
हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौट रहे युवा
राष्ट्रपति मुर्मू ने जगदलपुर के प्रसिद्ध ‘पंडुम कैफे’ की सफलता का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे बंदूक उठाने वाले हाथ अब लोगों को सेवा परोस रहे हैं। उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली अब हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट चुके हैं और कैफे चलाकर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। इसके साथ ही बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी यह साफ करती है कि नई पीढ़ी हिंसा का रास्ता छोड़कर खेल और स्वरोजगार के प्रति आकर्षित हो रही है।
देश में सिमटता माओवाद और नक्सली सरेंडर
देशभर में माओवाद के प्रभाव को लेकर राष्ट्रपति ने महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या कभी 126 हुआ करती थी, जो अब घटकर केवल 8 रह गई है। इसमें से भी केवल 3 जिले ही अब गंभीर रूप से प्रभावित माने जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 2 हजार से ज्यादा माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि वह दिन दूर नहीं जब भारत पूरी तरह से आतंकवाद और आंतरिक उग्रवाद से मुक्त हो जाएगा।
आदिवासी गौरव और संस्कृति का संरक्षण
आदिवासी विरासत को सहेजने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ में ‘शहीद वीर नारायण सिंह संग्रहालय’ का लोकार्पण इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि केंद्र सरकार ने भारतीय संविधान का अनुवाद संथाली भाषा में करवाकर आदिवासी समाज को उचित सम्मान दिया है। राष्ट्रपति के अनुसार देश के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए पूरे देश में विशेष म्यूजियम बनवाए जा रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने नायकों के बलिदान को जान सकें।



