
CG School Book Distribution: 17 जून 2025: छत्तीसगढ़ में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन हालात किसी उत्सव जैसे नहीं, बल्कि अफरा-तफरी वाले हैं। एक तरफ सरकार भविष्य की शिक्षा सुधार की बात कर रही है, दूसरी तरफ बच्चे स्कूलों में किताब और यूनिफॉर्म के इंतज़ार में खाली हाथ बैठे हैं। वजह है – TBC ऐप, जो इस बार शिक्षकों के लिए तकनीक नहीं, परेशानी बन गया है।
TBC ऐप ने बढ़ाई टीचर्स की मुसीबत
शिक्षा विभाग ने इस बार पाठ्यपुस्तकों के वितरण को डिजिटल करने के लिए TBC (Textbook Corporation) CG App लांच किया है। नियम ये है कि हर किताब को पहले इस ऐप से स्कैन और वेरिफाई किया जाएगा, तभी वह बच्चों को दी जा सकती है।
लेकिन जैसे ही स्कूल खुले, ऐप ने काम करना बंद कर दिया। कभी सर्वर डाउन, कभी बारकोड स्कैन न होना – ये समस्याएं इतनी गंभीर हैं कि शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल हाथ में लिए तकनीकी झंझट में उलझे हैं।
84 हजार बच्चे अब भी किताबों से वंचित
डिजिटल स्कैनिंग की प्रक्रिया धीमी होने और नेटवर्क की समस्याओं के चलते अब तक 84,000 से ज्यादा बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई हैं। यूनिफॉर्म की स्थिति भी यही है – ना कपड़े पहुंचे, ना माप लिए गए।
इस बार शाला प्रवेशोत्सव की रंगत भी गायब रही, क्योंकि किताबें और यूनिफॉर्म दोनों का टोटा पड़ा है। पहले जहां पहले दिन बच्चों को किताब और यूनिफॉर्म देकर स्वागत होता था, इस बार खाली बेंचें और उलझे शिक्षक ही नजर आए।
ग्रामीण इलाकों में हालात और बदतर
बालोद के मेड़की और ओरमा जैसे गांवों के स्कूलों में हालात और खराब हैं। कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, और जहां हैं भी, वे स्कैनिंग में व्यस्त हैं।
15 से 40 बच्चों वाली कक्षाओं को एक ही कमरे में बिठाया जा रहा है। बिना किताबों, बिना यूनिफॉर्म और बिना पर्याप्त शिक्षकों के पढ़ाई कैसी होगी? ये सवाल अब गांव-गांव में गूंज रहा है।
“शिक्षक पढ़ाएं या ऐप चलाएं?” — शिक्षक संघ का सवाल
छत्तीसगढ़ शालेय शिक्षक संघ और शिक्षक साझा मंच ने इस पूरी व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताई है।
प्रदेश मीडिया प्रभारी जितेंद्र शर्मा ने कहा,
“टीबीसी ऐप के कारण शिक्षक अपना मूल काम छोड़कर तकनीकी काम में उलझे हैं। इससे ना सिर्फ पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि शिक्षक की गरिमा को भी ठेस पहुंच रही है।”
हड़ताल पर सफाई कर्मी, स्कूलों की हालत और खराब
शिक्षा विभाग की समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। शिक्षा सत्र शुरू होते ही अंशकालीन सफाई कर्मचारी रायपुर में हड़ताल पर चले गए हैं। उनकी मांग है कि उन्हें पूर्णकालिक किया जाए और मानदेय बढ़ाया जाए।
अब स्कूलों में सफाई की व्यवस्था भी ठप पड़ी है। कक्षाएं गंदी, शौचालय अस्वच्छ और बच्चों के लिए बुनियादी सुविधा तक नहीं — ये स्थिति शिक्षा के मंदिरों में चिंता का विषय बन चुकी है।
शिक्षा व्यवस्था तकनीक में उलझी, जमीन से कटी
सरकार ने तकनीक लाने की कोशिश तो की, लेकिन जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया। एक तरफ टीचर्स मोबाइल लेकर स्कैनिंग में व्यस्त हैं, दूसरी तरफ बच्चों के पास किताब नहीं, पढ़ाई नहीं।
अब सवाल ये है कि जब शिक्षक स्कैनिंग करेंगे, तो पढ़ाएंगे कब? और जब बच्चों को किताबें ही नहीं मिलेंगी, वे सीखेंगे क्या?
शिक्षा विभाग के लिए अलार्म बेल
इस पूरे हालात ने ये साफ कर दिया है कि तकनीक थोपना और तकनीक लागू करना — दोनों में फर्क होता है। बिना तैयारी के लाए गए सिस्टम ने पूरे राज्य में शिक्षा व्यवस्था को लड़खड़ा दिया है।
शिक्षा विभाग को अब चाहिए कि वो फील्ड की सच्चाई सुने, तकनीक को सहयोगी बनाए, न कि बोझ। जब तक शिक्षक, बच्चे और व्यवस्था एक साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई भी ऐप शिक्षा का भविष्य नहीं बदल सकता।



