Hartalika Teej 2025: तीजा मनाने मायके आयेगी माता कौशल्या, चंद्रखुरी में मनाएंगी गौरी तीज, ससुराल से लेने गए दो लोग अयोध्या

रायपुर: हरतालिका तीज के खास मौके पर इस बार माता कौशल्या अयोध्या से अपने मायके चंद्रखुरी लौट रही हैं, जहां वे गौरी तीज का पर्व मनाएंगी। इस आयोजन को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। माता की प्रतीकात्मक विदाई कराने के लिए चंद्रखुरी से दो प्रतिनिधि अयोध्या रवाना हो चुके हैं। वे माता की विदाई कराकर 4 अगस्त को रायपुर वापस लौटेंगे।

गौरतलब है कि इस साल हरतालिका तीज 26 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी, जिसे गौरी तीज भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विवाहित महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय जीवन की कामना के लिए उपवास करती हैं। परंपरा यह भी है कि बेटियां यह पर्व अपने मायके में मनाती हैं। इसी परंपरा को जीवंत करते हुए माता कौशल्या को भी उनके मायके चंद्रखुरी लाया जा रहा है, जहां वे यह त्योहार मनाएंगी।

क्या है पूरा कार्यक्रम?

गौरी तीज इस बार 26 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। परंपरा के अनुसार, इस दिन बेटियां अपने मायके लौटती हैं और वहीं तीज का त्योहार मनाती हैं। इसी मान्यता को निभाते हुए माता कौशल्या को अयोध्या से चंद्रखुरी लाने की तैयारी की गई है। उनकी प्रतीकात्मक विदाई के लिए कौशल्या धाम से दो प्रतिनिधि — डॉ. पुरुषोत्तम चंद्राकर और राजेश शर्मा — अयोध्या भेजे गए हैं। ये दोनों 4 अगस्त को माता कौशल्या की विदाई कराकर रायपुर लौटेंगे।

धार्मिक परंपरा और विधान

चित्रोत्पला लोक कला परिषद के निदेशक राकेश तिवारी ने बताया कि यह आयोजन पूरी तरह पौराणिक परंपराओं के अनुसार किया जा रहा है। माता कौशल्या को लाने से पहले, अयोध्या रवाना होने वाले प्रतिनिधियों ने अंगाकर रोटी का विधान पूरा किया। परंपरा के तहत उन्होंने यात्रा के लिए अंगाकर रोटी, गुड़ और अचार साथ लिया। इस अनूठी रस्म को “लेवाल पठोने” कहा जाता है, जिसे इस बार छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पूजा यादव के घर से सम्पन्न किया गया। इसके बाद ही विदाई टोली अयोध्या के लिए रवाना हुई।

अयोध्या में कैसे होगी विदाई की परंपरा पूरी?

चित्रोत्पला लोक कला परिषद के निदेशक राकेश तिवारी ने बताया कि अयोध्या पहुंचने के बाद दोनों प्रतिनिधि पहले रात में विश्राम करेंगे। अगले दिन सुबह स्नान कर वे राजा दशरथ के दरबार में उपस्थित होंगे और वहां माता कौशल्या को मायके लाने की अनुमति मांगेंगे। राजा दशरथ, राजगुरु और मुनियों की अनुमति मिलने के बाद दोनों सरयू नदी में स्नान करेंगे और फिर अयोध्या के गुरु से माता कौशल्या की मूर्ति के निर्माण हेतु मिट्टी प्राप्त करेंगे। मिट्टी लेकर दशरथ भवन की परिक्रमा कर वे वापस कौशल्या धाम के लिए रवाना होंगे और 4 अगस्त को रायपुर लौट आएंगे।

मिट्टी से बनेगी बहन कौशल्या की मूर्ति

अयोध्या से लाई गई मिट्टी को कौशल्या धाम के मूल कुम्हार परिवार के वंशज पांडू राम को सौंपा जाएगा। उनके द्वारा उसी मिट्टी से माता कौशल्या की मूर्ति तैयार की जाएगी। यह मूर्ति यहां बहन कौशल्या के रूप में स्थापित की जाएगी, क्योंकि परंपरा के अनुसार अयोध्या से आने के बाद कौशल्या अपने मायके आ जाती हैं और फिर वे ससुराल की रानी नहीं, बल्कि यहां की बेटी मानी जाती हैं।

चार दिन की पूजा, फिर विसर्जन

राकेश तिवारी ने बताया कि गौरी तीज के दिन से बहन कौशल्या की पूजा प्रारंभ होगी। परंपरा के अनुसार उनका श्रृंगार किया जाएगा और चार दिनों तक विधिवत पूजा-अर्चना होगी। चूंकि यह मायके की पूजा होती है, इसलिए मूर्ति मंदिर में नहीं, बल्कि घर पर स्थापित की जाती है। इस बार मूर्ति की स्थापना छत्तीसगढ़ की पंडवानी गायिका पूजा यादव के घर पर की जाएगी, जहां गांव के लोग पूजा में शामिल होंगे। चार दिन की पूजा के बाद अंतिम दिन कौशल्या धाम स्थित जल सरोवर में माता कौशल्या का विधिवत स्नान और फिर विसर्जन किया जाएगा।

मंदिर नहीं, घर में होती है पूजा – खास वजह है पीछे

हरियाली तीज के अवसर पर माता कौशल्या के कौशल्या धाम आगमन को लेकर मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित गणेश महाराज ने जानकारी दी कि इस पूजा का आयोजन मंदिर परिसर में नहीं बल्कि उसके बाहर होता है। इसकी वजह यह है कि माता कौशल्या इस मौके पर बेटी बनकर मायके आती हैं। इसलिए उनकी मूर्ति को मंदिर में नहीं रखा जाता बल्कि मायके के प्रतीक रूप में किसी घर में स्थापित किया जाता है। उन्होंने बताया कि जलाशय में स्नान और पूजा से जुड़े विधान मंदिर परिसर में ही पूरे किए जाते हैं, लेकिन बाकी सभी परंपराएं घर पर निभाई जाती हैं।

हरतालिका या गौरी तीज की मान्यता क्या कहती है?

भुवनेश्वर महादेव मंदिर (बिलवाई, अयोध्या) के पुजारी पंडित शिवदत्त मणि त्रिपाठी ने हरतालिका और गौरी तीज की धार्मिक मान्यता को लेकर बताया कि यह त्योहार खासतौर पर सुहागन महिलाओं और कन्याओं के लिए होता है। सुहागन महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। जिन लड़कियों की शादी तय हो चुकी होती है, वे अपने होने वाले पति के लिए, और कुंवारी लड़कियां अपने लिए भगवान शिव जैसे वर की कामना करते हुए पूजा करती हैं।

पंडित शिवदत्त ने बताया कि माता पार्वती (गौरी) ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया था। उसी प्रसंग को ध्यान में रखकर यह व्रत रखा जाता है।

हरियाली तीज और मायके आने की परंपरा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, शादी के बाद बेटियां अपना पहला सावन मायके में मनाती हैं। यह भी मान्यता है कि हरियाली तीज के दिन देवी राधा अपने मायके बरसाना आई थीं। तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि सावन के दौरान बेटियों को मायके बुलाया जाता है और उनके स्वागत में विशेष आयोजन होते हैं। यही परंपरा माता कौशल्या के आगमन में भी झलकती है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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