
रायपुर में 10 फरवरी को होने वाले मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह समारोह से पहले एक नया विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही कार्यक्रम स्थल पर टेंट लगाने का काम शुरू करवा दिया। नियम के मुताबिक किसी भी सरकारी काम के लिए पहले टेंडर निकाला जाता है और फिर सबसे कम बोली लगाने वाली एजेंसी को वर्क ऑर्डर दिया जाता है। लेकिन यहां बिना किसी औपचारिक आदेश के पंडाल खड़ा हो गया है।
कागजी खानापूर्ति पर उठे गंभीर सवाल
हैरानी की बात यह है कि विभाग के कार्यक्रम अधिकारी ने कंपनियों को प्रेजेंटेशन के लिए 5 फरवरी को बुलाया था। जबकि हकीकत में मैदान पर काम इससे पहले ही शुरू हो चुका था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब एजेंसी का चयन ही नहीं हुआ और कांट्रेक्ट साइन नहीं हुआ, तो फिर काम करने वाली कंपनी को किसने हरी झंडी दी। यह सीधे तौर पर सरकारी नियमों की अनदेखी और चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का मामला लग रहा है।
पांच बड़ी कंपनियां थीं रेस में शामिल
इस आयोजन के लिए छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (CSIDC) ने पांच बड़ी फर्मों को प्रजेंटेशन के लिए आमंत्रित किया था। इनमें दिल्ली, रायपुर और बिलासपुर की नामी कंपनियां शामिल थीं। जब इन कंपनियों के बीच चयन की प्रक्रिया चल ही रही थी, तब ग्राउंड पर काम शुरू होना यह दर्शाता है कि शायद अंदरखाने फैसला पहले ही लिया जा चुका था। विपक्ष का आरोप है कि प्रेजेंटेशन की प्रक्रिया केवल दिखावा मात्र है।
जंबूरी आयोजन की यादें हुई ताजा
कांग्रेस प्रवक्ता सुबोध हरितवाल ने इस मामले की तुलना पिछले जंबूरी कार्यक्रम से की है। उन्होंने कहा कि जंबूरी के समय भी जेम पोर्टल पर टेंडर खुलने से पहले ही एक निजी कंपनी ने काम शुरू कर दिया था। विभाग की यह कार्यशैली अब एक पैटर्न बन गई है जहां काम पहले सौंप दिया जाता है और कागजी प्रक्रिया बाद में पूरी की जाती है। इस तरह की कार्यप्रणाली भविष्य में बड़े वित्तीय भ्रष्टाचार का कारण बन सकती है।
पारदर्शिता को लेकर कांग्रेस का हमला
कांग्रेस महामंत्री मलकीत सिंह गैदू ने कहा कि सामूहिक विवाह जैसे पुनीत आयोजन में सरकारी पैसे का उपयोग होता है और इसमें पारदर्शिता होना बेहद जरूरी है। बिना टेंडर के काम शुरू होना भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है। पार्टी ने मांग की है कि इस पूरे आयोजन से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी बताया जाए कि बिना वर्क ऑर्डर के काम शुरू करने की अनुमति किस अधिकारी ने दी है।
जिम्मेदारी से बच रहा प्रशासन
इस पूरे मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अधिकारियों की देखरेख में चल रहे इस काम को लेकर अब तक प्रशासन की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया है। फिलहाल रायपुर के मैदानी इलाकों में टेंट लगाने का काम जोरों पर है, लेकिन कानूनी रूप से यह किसकी जिम्मेदारी है, इस पर सस्पेंस बना हुआ है। अब देखना होगा कि इस गड़बड़ी पर सरकार क्या कदम उठाती है।



