धान खरीदी में ‘सरकारी चूहों’ का आतंक: हर स्तर पर हो रही लूट, क्या भ्रष्टाचार के कारण फेल हो रहे सुशासन के दावे?

छत्तीसगढ़ में धान की खेती और खरीदी को लेकर दावों और हकीकत के बीच एक बड़ी खाई नजर आती है। प्रदेश के 25 लाख से अधिक किसानों की मेहनत और सरकारी खजाने पर ‘दो पैरों वाले चूहों’ का डाका बदस्तूर जारी है। धान खरीदी केंद्रों से लेकर राशन दुकानों तक फैला यह मकड़जाल इतना मजबूत है कि सरकारें बदलने के बाद भी भ्रष्टाचार का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि इस लीकेज को रोक दिया जाए, तो प्रदेश का 50 फीसदी से अधिक राशन और करोड़ों रुपये बचाए जा सकते हैं।

मंडी स्तर पर ‘सूखत’ के नाम पर पहली चोट

भ्रष्टाचार का यह खेल मंडी की दहलीज से ही शुरू हो जाता है। जब किसान अपनी उपज बेचने लाता है, तो ‘सूखत’ के नाम पर जबरन 2 प्रतिशत धान कम कर दिया जाता है। हर साल किसान संगठन इस कटौती पर सवाल उठाते हैं, लेकिन प्रशासन शेड और चबूतरे के वादों में उलझा रहता है। खुले में रखे धान के कारण नमी, धूप और बारिश से जो नुकसान होता है, उसकी पूरी भरपाई किसान की जेब से ही की जाती है, जो धांधली की पहली सीढ़ी है।

संग्रहण केंद्रों में सबसे ज्यादा सक्रिय ‘सरकारी चूहे’

धान खरीदी के बाद जब स्टॉक संग्रहण केंद्रों तक पहुंचता है, तो असली ‘धान पार्टी’ शुरू होती है। गोदामों में चूहों द्वारा धान खाने की खबरें आम हैं, लेकिन हकीकत में यहीं से धान गायब करने का बड़ा खेल होता है। बोरियों में कंकड़-मिट्टी मिलाना और बारिश में लापरवाही से धान को भीगने देना, इसी साजिश का हिस्सा है। आंकड़ों के मुताबिक, इस स्तर पर होने वाला नुकसान 5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जिसकी आड़ में करोड़ों का माल ठिकाने लगा दिया जाता है।

मिलिंग के दौरान चावल की हेराफेरी का बड़ा खेल

धान से चावल बनाने की प्रक्रिया यानी मिलिंग को सबसे संवेदनशील कड़ी माना जाता है। आरोप है कि कई मिलर्स सरकारी धान से निकले उच्च गुणवत्ता वाले चावल को खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। इसके बदले, बाजार से घटिया और अमानक चावल खरीदकर शासन के जरिए राशन दुकानों तक पहुंचा दिया जाता है। इस स्तर पर करीब 10 प्रतिशत तक के हेरफेर की आशंका जताई जाती है, जिसमें विभाग और मिलर्स की मिलीभगत की चर्चा आम है।

राशन दुकानों से सीधे बाजार पहुंच रहा सरकारी चावल

प्रदेश के करीब 71 लाख राशन कार्डधारियों तक पहुंचने वाला चावल भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि एक बड़ा वर्ग राशन दुकान से मिलने वाले चावल को 17 से 20 रुपये प्रति किलो की दर से बिचौलियों को बेच देता है। यह चावल फिर से चक्र में घूमकर सरकारी गोदामों या खुले बाजार में पहुंच जाता है। निगरानी तंत्र की विफलता के कारण सरकारी सब्सिडी का यह पैसा गरीबों के बजाय बिचौलियों की जेब में जा रहा है।

धान की बर्बादी और घाटे का जिलावार गणित

छत्तीसगढ़ के विभिन्न चरणों में होने वाली धान की बर्बादी और संभावित नुकसान को नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:

चरण (Level)नुकसान का कारणसंभावित हानि प्रतिशत
मंडी स्तरसूखत और खुले में भंडारण2% – 3%
संग्रहण केंद्रचोरी, बारिश और जीव-जंतु5% – 7%
राइस मिलिंगगुणवत्ता में बदलाव और हेरफेर10% – 12%
वितरण (PDS)कालाबाजारी और अवैध बिक्री25% – 30%
कुल संभावित नुकसानसमग्र सिस्टम की खामी50% से अधिक

विपक्ष का आरोप: 36 हजार करोड़ के ‘नान’ घोटाले की पुनरावृत्ति

किसान संगठनों और विपक्ष का दावा है कि वर्तमान व्यवस्था में मंडी से लेकर वितरण तक करीब 50 प्रतिशत से अधिक की लूट हो रही है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के पिछले कार्यकाल में हुआ 36 हजार करोड़ का ‘नान घोटाला’ इसी भ्रष्ट सिस्टम की उपज था। नेताओं का कहना है कि आज भी उसी पुराने ढर्रे पर काम हो रहा है, जिससे किसानों का भला होने के बजाय केवल बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियां भर रही हैं।

सरकार का तर्क: ‘चूहा’ छोटा हिस्सा, दोषियों पर होगी कार्रवाई

इन गंभीर आरोपों के बीच उप मुख्यमंत्री अरुण साव का कहना है कि आंकड़ों में अंतर के कई तकनीकी कारण होते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि धान को नुकसान पहुंचाने में चूहों की भूमिका भी होती है, लेकिन वह कुल समस्या का बहुत छोटा हिस्सा है। सरकार का दावा है कि जो भी अधिकारी इस प्रक्रिया में गड़बड़ी करते पाए जा रहे हैं, उन पर सख्त कार्रवाई की जा रही है और पूरे सिस्टम की डिजिटल मॉनिटरिंग की जा रही है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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