
छत्तीसगढ़ में वर्तमान सरकार ‘सुशासन’ का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन हालिया आबकारी नीति के फैसलों ने इस दावे की हवा निकाल दी है। वर्ष 2026-27 की नई शराब नीति में होली, मुहर्रम और 30 जनवरी जैसे संवेदनशील दिनों से ‘ड्राई डे’ का प्रतिबंध हटाना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। एक तरफ सरकार भाईचारे और सौहार्द की बात करती है, तो दूसरी तरफ ऐसे त्योहारों पर शराब की दुकानें खुली रखकर विवादों को निमंत्रण दे रही है। यह निर्णय स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि सरकार के लिए सामाजिक मर्यादा और शांति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण राजस्व (रेवेन्यू) के आंकड़े हो गए हैं। सरकार के विरोधाभासी बयानों ने प्रशासनिक असमंजस को और गहरा कर दिया है।
अधिकारियों की मनमानी या राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव?
प्रदेश के गलियारों में यह चर्चा आम है कि क्या नौकरशाही अब निर्वाचित सरकार पर हावी हो चुकी है। जब सरकार सार्वजनिक मंचों से होली पर ड्राई डे की बात करते हैं और विभागीय फाइलें कुछ और ही कहानी कहती हैं, तो जनता के मन में संशय पैदा होना स्वाभाविक है। क्या यह सरकार को भीतर से कमजोर करने की साजिश है या फिर मंत्रियों में ठोस निर्णय लेने के साहस की कमी है? राजस्व बटोरने की इस अंधी दौड़ में यह भुला दिया गया कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में शराब के कारण होने वाले घरेलू विवाद और सामाजिक अपराध पहले ही एक बड़ी चुनौती हैं।
होली का हुड़दंग और सुरक्षा के गिरते मापदंड
होली रंगों और खुशियों का पर्व है, जिसमें हर धर्म और संप्रदाय के लोग शामिल होते हैं। ऐसे में शराब दुकानों का खुला रहना न केवल माहौल खराब होने की आशंका बढ़ाता है, बल्कि हुड़दंगियों को खुली छूट देने जैसा है। पूर्व में होली की पूर्व संध्या से ही पुलिस सघन चेकिंग करती थी और अवैध भंडारण पर लगाम कसी जाती थी। अब जब सरकारी दुकानों से ही जाम छलकाने की अनुमति होगी, तो सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना पुलिस के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं होगा। सरकार का यह तर्क कि इससे अवैध बिक्री कम होगी, गले उतरने लायक नहीं है क्योंकि उपलब्धता बढ़ने से खपत और अपराध दोनों में इजाफा तय है।
पुरानी परंपराओं की बलि चढ़ाती नई आबकारी नीति
छत्तीसगढ़ की एक लंबी परंपरा रही है कि बड़े त्योहारों पर पूर्णतः शुष्क दिवस (Dry Day) रखा जाता था ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे। पुलिस की सख्ती के कारण लोग सार्वजनिक स्थानों पर नशा करने से कतराते थे। नई नीति ने इन सुरक्षा घेरों को तोड़ दिया है। अब प्रतिबंध हटने से उन परिवारों की चिंता बढ़ गई है जो होली को एक पवित्र और सुरक्षित पर्व के रूप में देखते हैं। राजस्व के लिए परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की बलि चढ़ाना किसी भी ‘हितैषी’ सरकार के लिए शोभा नहीं देता।
जनता का आक्रोश और सुशासन की धूमिल होती छवि
विपक्ष और आम जनता के बीच इस फैसले को लेकर गहरा आक्रोश है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक यह सवाल तैर रहा है कि क्या ‘साय सरकार’ सुशासन की सरकार में “विकसित छत्तीसगढ़” के वादे से पूरी तरह पलट चुकी है? सरकार के भीतर चल रही खींचतान और फैसलों में देरी से जनता का विश्वास डगमगा रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह जनहित और लोक-लज्जा का ध्यान रखे। केवल कागजी आंकड़ों को दुरुस्त करने के लिए सामाजिक सौहार्द को दांव पर लगाना आत्मघाती साबित हो सकता है।
आइना देखने का वक्त
अंततः, सरकार को यह विचार करना होगा कि वह इतिहास में एक ‘राजस्व वसूली केंद्र’ के रूप में याद की जाना चाहती है या एक ‘नैतिक नेतृत्व’ के रूप में। होली जैसे त्योहारों पर शराब की नदियां बहाकर विकास का दावा करना बेमानी है। वक्त आ गया है कि सरकार अपने सलाहकारों और आबकारी विभाग के अधिकारियों के चश्मे को उतारकर आम जनता की नज़रों से प्रदेश की स्थिति को देखे। सही समय पर सही फैसले लेना ही सुशासन की पहली शर्त है, वरना ‘यूटर्न’ वाली सरकार की छवि बनने में अधिक समय नहीं लगेगा।
पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार ही प्रतिबंध प्रभावी
तमाम ऊहापोह और कयासों के बीच मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। गिरौदपुरी मेले के दौरान मीडिया से चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने दोटूक शब्दों में घोषणा की है कि होली के पावन अवसर पर प्रदेश में ‘ड्राई डे’ का कड़ाई से पालन किया जाएगा और किसी भी हाल में शराब दुकानें नहीं खुलेंगी। नई आबकारी नीति के तहत प्रतिबंध हटने की चर्चाओं को खारिज करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार अपनी संस्कृति और पर्वों की मर्यादा को सहेजने के लिए प्रतिबद्ध है, इसलिए पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार ही शुष्क दिवस प्रभावी रहेगा। मुख्यमंत्री के इस निर्णायक कदम ने न केवल राजस्व से ऊपर जनहित और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता दी है, बल्कि उन तमाम अटकलों को भी शांत कर दिया है जो त्योहार के दौरान अव्यवस्था की आशंका पैदा कर रही थीं।



