छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मूल विषय पर सरकार का नहीं है ध्यान, इसलिए चंगाई सभाओं की ओर मुड़ रहे लोग, हालात बेहद नाजुक

रायपुर: छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मुद्दे पर सियासी बहस तो खूब होती है, लेकिन इसके असली कारणों पर सरकार की पकड़ ढीली नजर आती है। मीडिया रिपोर्ट्स और जमीनी हकीकत बताती है कि प्रदेश के आदिवासी अंचलों में धर्मांतरण का सबसे बड़ा कारण खराब स्वास्थ्य व्यवस्था है। जब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपनी पुरानी और जटिल बीमारियों से परेशान हो जाते हैं और सरकारी अस्पतालों में उन्हें कोई उम्मीद नहीं दिखती, तो वे धर्म विशेष की ‘प्रार्थना सभाओं’ या चंगाई सभाओं का रुख करते हैं। विश्वास और अंधविश्वास के इस खेल में स्वास्थ्य सुविधाओं की लापरवाही आग में घी का काम कर रही है। बस्तर जैसे संवेदनशील इलाकों में तो स्थिति इतनी भयावह है कि खुद सत्ता पक्ष के नेताओं को सदन में अपनी ही सरकार को घेरना पड़ रहा है।

बस्तर संभाग में विशेषज्ञों का अकाल: 355 में से 310 पद खाली, सुकमा में एक भी विशेषज्ञ नहीं

बस्तर संभाग के स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति आंकड़ों के जरिए समझी जा सकती है। प्राथमिक और जिला अस्पतालों में विशेषज्ञों के सैकड़ों पद स्वीकृत हैं, लेकिन हकीकत में वहां कुर्सियां खाली पड़ी हैं। जगदलपुर के महारानी मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े संस्थान में भी कैंसर, हार्ट या न्यूरो के डॉक्टर मिलना तो दूर, आंखों और त्वचा के सामान्य विशेषज्ञ तक मौजूद नहीं हैं। नीचे दी गई तालिका बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों में डॉक्टरों की भारी कमी को दर्शाती है:

क्षेत्र (जिला)स्वीकृत पद (विशेषज्ञ)मौजूद डॉक्टरों की संख्याखाली पदों की स्थिति
बस्तर671255
कांकेर681454
कोंडागांव510744
नारायणपुर310526
दंतेवाड़ा440440
बीजापुर620359
सुकमा320032
कुल योग35545310

टेंडर और बजट के बीच अटका विकास: 85 करोड़ के प्रोजेक्ट पर प्रशासन की सुस्ती

सरकार ने जगदलपुर के महारानी अस्पताल में एमआरडी, हिमोडायलिसिस और कैंसर क्लिनिक बनाने के लिए करोड़ों रुपये का बजट तो तय किया है, लेकिन धरातल पर काम शुरू नहीं हो पा रहा है। महिलाओं के लिए एमआरडी बिल्डिंग और कैंसर यूनिट के लिए करीब 85 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं, पर टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण निर्माण कार्य अटका हुआ है। डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों को मजबूरी में रायपुर, हैदराबाद या तेलंगाना जाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कई बार बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाकर थक जाते हैं और बिना इलाज के वापस लौट आते हैं, जो आगे चलकर धर्मांतरण के जाल में फंसने का मुख्य कारण बनता है।

211 करोड़ का सुपर स्पेशलिटी अस्पताल अब ‘प्राइवेट’ हाथों में: वेतन के फेर में नहीं मिले सरकारी डॉक्टर

जगदलपुर में 11 मंजिला भव्य सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनकर तैयार है, जिसका उद्घाटन खुद प्रधानमंत्री ने किया था। लेकिन सरकार यहां डॉक्टरों का इंतजाम नहीं कर पाई। बताया जा रहा है कि विशेषज्ञ डॉक्टर महीने के 5 से 7 लाख रुपये वेतन मांग रहे हैं, जबकि सरकार 2 लाख से ज्यादा देने को तैयार नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि अब सरकार ने साउथ के ‘कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल’ के साथ समझौता किया है। इस अनुबंध के तहत अस्पताल की कमाई का 80 प्रतिशत हिस्सा निजी कंपनी को जाएगा और सरकार को केवल 20 प्रतिशत मिलेगा। साल भर से यह अस्पताल केवल ओपीडी के सहारे चल रहा है और एक भी मरीज यहां भर्ती नहीं हो सका है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के सवाल पर स्वास्थ्य मंत्री का आश्वासन

बस्तर की इस चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने खुद विधानसभा में सवाल उठाए हैं। उन्होंने चिंता जताई कि डॉक्टरों की कमी के कारण आदिवासियों को पड़ोसी राज्यों की शरण लेनी पड़ रही है। इस पर स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल का कहना है कि सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि निर्माण कार्यों के लिए पीडब्ल्यूडी को पैसा दे दिया गया है और टेंडर की प्रक्रिया जारी है। मंत्री ने यह भी दावा किया कि निजी कंपनी के साथ अनुबंध हो चुका है और जनवरी से सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में मरीजों की भर्ती और पूर्ण संचालन शुरू कर दिया जाएगा।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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