
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के पांचवे दिन में प्रश्नकाल के दौरान वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने राज्य की सांस्कृतिक नीतियों को लेकर पर्यटन मंत्री को घेरा। उन्होंने पर्यटन और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल से छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के गठन, उसके उद्देश्यों और अब तक किए गए कार्यों का पूरा ब्यौरा मांगा। चंद्राकर ने विशेष रूप से परिषद की नियमावली में हुए संशोधनों और उनके परिणामों पर स्पष्टीकरण की मांग की, जिससे सदन में राज्य की कला और साहित्य के संरक्षण को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई।
2020 में हुई थी परिषद की स्थापना
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए छत्तीसगढ़ शासन ने 27 अक्टूबर 2020 को इस परिषद का गठन किया था। सरकार की ओर से बताया गया कि इसका प्राथमिक लक्ष्य प्रदेश की लुप्त होती लोक कलाओं, आदिवासी संस्कृति, संगीत और सिनेमा को पुनर्जीवित करना है। यह संस्था न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करती है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की अकादमियों के साथ तालमेल बिठाकर छत्तीसगढ़ की पहचान को वैश्विक स्तर पर ले जाने का प्रयास भी कर रही है।
विभिन्न विधाओं के लिए बनाई गई नौ अलग अकादमियां
परिषद के कामकाज को सुचारू बनाने के लिए इसे नौ अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। इनमें साहित्य अकादमी, कला अकादमी और आदिवासी लोक कला अकादमी जैसे महत्वपूर्ण विभाग शामिल हैं। इसके अलावा साहित्यकारों के सम्मान में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पीठ और श्रीकांत वर्मा पीठ की स्थापना भी की गई है। वहीं, अनुसूचित जाति की कलाओं के शोध के लिए गुरु घासीदास शोध पीठ और राज्य की फिल्मों के विकास के लिए फिल्म विकास निगम भी इसी परिषद के अधीन कार्यरत हैं।
साहित्य अकादमी: अध्यक्ष के अधिकार और कामकाज का लेखा-जोखा
साहित्य अकादमी के कार्यों पर पूछे गए सवाल के जवाब में बताया गया कि वर्तमान में श्री शशांक शर्मा इसके अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्हें बजट प्रबंधन से लेकर विशेषज्ञों की सलाह लेने तक के व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अकादमी का मुख्य कार्यक्षेत्र हिंदी और स्थानीय साहित्य का संवर्धन करना है। आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2022-23 में अकादमी ने विभिन्न साहित्यिक आयोजनों और संगोष्ठियों पर करीब 92.44 लाख रुपये खर्च किए हैं।
लाखों के खर्च से हुए बड़े साहित्यिक आयोजन
सरकार ने सदन में अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की सूची भी पेश की। रायपुर में आयोजित ‘मुक्तिबोध प्रसंग’ पर 7.24 लाख और ‘स्त्री-2023 सृजन और सरोकार’ जैसे बड़े कार्यक्रम पर 13.94 लाख रुपये व्यय किए गए। इसके अलावा बिलासपुर और रायगढ़ में भी क्षेत्रीय साहित्यकारों को समर्पित विशेष आयोजन हुए। मंत्री ने बताया कि इन कार्यक्रमों का उद्देश्य स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना और नई पीढ़ी को अपनी साहित्यिक जड़ों से जोड़ना रहा है।
मानदेय और भत्तों के नियमों में हुए बड़े बदलाव
परिषद के ढांचे में हुए बदलावों की जानकारी देते हुए बताया गया कि सितंबर 2021 में एक संशोधित अधिसूचना जारी की गई थी। इसके तहत विभिन्न अकादमियों और शोध पीठों के अध्यक्षों के मानदेय में बढ़ोतरी की गई। अध्यक्षों का मासिक मानदेय 75 हजार रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दिया गया है। साथ ही, साहित्य, कला और आदिवासी लोक कला अकादमी के अध्यक्षों के लिए 50 हजार रुपये का वाहन भत्ता भी तय किया गया है ताकि वे प्रदेश भर में सांस्कृतिक गतिविधियों का बेहतर निरीक्षण कर सकें।
CG-VIDHANSABHA2025-26 की हालिया गतिविधियां और भविष्य की योजना
पिछले एक साल की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने बताया कि जनवरी 2026 तक कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम संपन्न हुए हैं। इनमें अखिल भारतीय जनजातीय लेखक सम्मेलन और अटल स्मृति कवि सम्मेलन जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इन आयोजनों पर हुई खर्च राशि का अनुमोदन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली सामान्य सभा की अगली बैठक में किया जाएगा। सरकार का दावा है कि ये गतिविधियां छत्तीसगढ़ी संस्कृति को नई ऊंचाई पर ले जाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।
सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में नई उम्मीद
विधायक के सवालों और मंत्री के जवाबों के बीच यह साफ हुआ कि छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर सजग है। हालांकि, विपक्ष ने खर्च की गई राशि और उनके जमीनी परिणामों पर अपनी नजरें टिका रखी हैं। परिषद के माध्यम से सिंधी अकादमी और राजभाषा आयोग जैसी संस्थाएं भी अपनी बोलियों और साहित्य को बचाने के लिए दस्तावेजीकरण का काम कर रही हैं, जिससे उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में प्रदेश की विविधता और भी निखरकर सामने आएगी।



