
छत्तीसगढ़ के वाड्रफनगर स्थित बसंतपुर थाना क्षेत्र से एक हृदय विदारक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ एक 12 वर्षीय गर्भवती रेप पीड़िता को न्याय दिलाने के बजाय, स्थानीय सरपंच ने मध्यकालीन क्रूरता का परिचय देते हुए उसे और उसके पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया है। यह घटना आधुनिक समाज में कानून व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। जहाँ एक ओर मासूम बच्ची शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजर रही है, वहीं दूसरी ओर पंचायत के रसूखदारों ने उसे समर्थन देने के बजाय सामाजिक प्रताड़ना का शिकार बना दिया है।
FIR दर्ज कराने की मिली खौफनाक सजा
इस मामले का सबसे काला पक्ष यह है कि परिवार को यह सजा केवल इसलिए दी गई क्योंकि उन्होंने आरोपी के विरुद्ध पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने का साहस दिखाया। पीड़िता ने जब अपने साथ हुए अनाचार के खिलाफ आवाज उठाई और कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया, तो गाँव के सरपंच ने इसे ‘पंचायत की अवहेलना’ करार देते हुए तुगलकी फरमान जारी कर दिया। आरोपी के रसूख और स्थानीय दबाव के चलते परिवार पर एफआईआर वापस लेने का दबाव बनाया गया था, जिसे न मानने पर सरपंच ने पूरे परिवार को समाज से बेदखल करने का निर्णय लिया।
12 साल के लिए परिवार को समाज से निकाला
सरपंच द्वारा सुनाई गई सजा की अवधि और प्रकृति बेहद अमानवीय है। पीड़ित परिवार को अगले 12 वर्षों तक के लिए सामाजिक बहिष्कार की सजा दी गई है। इस दौरान परिवार का कोई भी सदस्य न तो किसी सार्वजनिक आयोजन में शामिल हो सकेगा और न ही गाँव का कोई अन्य व्यक्ति उनसे किसी भी प्रकार का संपर्क रख सकेगा। एक मासूम गर्भवती बच्ची, जिसे इस समय सबसे अधिक देखभाल और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता है, उसे और उसके परिजनों को अपनों के बीच ही अजनबी बना दिया गया है।
न्याय की गुहार और प्रशासन की सक्रियता पर सवाल
सामाजिक प्रताड़ना झेल रहे इस परिवार ने अब जिला प्रशासन और पुलिस के उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई है। पीड़िता ने मांग की है कि न केवल बलात्कार के आरोपी को सलाखों के पीछे भेजा जाए, बल्कि उन लोगों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाए जिन्होंने कानून को हाथ में लेकर इस बहिष्कार की साजिश रची है। प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह पीड़ित परिवार को समाज में पुनः सम्मानजनक स्थान दिलाए और ऐसी कुरीतियों को बढ़ावा देने वाले जनप्रतिनिधियों पर लगाम कसे।



