
भिलाई: Durg News: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक छोटे से व्यापारी प्रदीप जैन के लिए पत्रकारिता का शौक उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अभिशाप बन गया। वे भिलाई में साइकिल की दुकान और डेयरी का बड़ा कारोबार चलाते थे, लेकिन साथ ही वे स्थानीय अखबारों में पुलिस की भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के खिलाफ लेख भी लिखते थे। उनकी बेबाक कलम कुछ पुलिस अधिकारियों को इस कदर खटकने लगी कि उन्हें रास्ते से हटाने के लिए एक गहरी साजिश रची गई। यह एक साधारण नागरिक के खिलाफ सत्ता और वर्दी के दुरुपयोग की ऐसी कहानी है, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को पूरी तरह बर्बाद कर दिया।
साजिश का जाल: पहले बहू की हत्या का झूठा केस, फिर लगा दिया अफीम तस्करी का आरोप
घटना की शुरुआत 28 दिसंबर 1994 को एक मामूली पारिवारिक विवाद से हुई। भिलाई कोतवाली के तत्कालीन थानेदार दिलीप सिंह राठौर ने प्रदीप जैन और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया। उन पर अपनी ही बहू को जलाकर मारने का संगीन आरोप मढ़ा गया। पत्नी को तो जेल भेज दिया गया, लेकिन प्रदीप को सबक सिखाने के लिए पुलिस ने एक और चाल चली। अगले ही दिन सुपेला थाना प्रभारी एम.डी. तिवारी ने उन पर अफीम बेचने का फर्जी केस बनाकर एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धाराएं जोड़ दीं। मकसद साफ था कि प्रदीप जैन किसी भी हाल में जेल से बाहर न आ सकें।
जेल की वो दहला देने वाली रातें: हथकड़ी पहनकर दी पिता को मुखाग्नि, आंखों के सामने उजड़ गया साम्राज्य
कैद के दौरान प्रदीप जैन ने जो सहा, वह रूह कंपा देने वाला है। जब उनके पिता का निधन हुआ, तो उन्हें अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया, लेकिन पुलिस ने उनकी हथकड़ी नहीं खोली। प्रदीप ने बेड़ियों में जकड़े हाथों से ही अपने पिता की चिता को आग दी। जेल के भीतर उन पर जानलेवा हमले हुए और बाहर उनका करोड़ों का डेयरी कारोबार तबाह हो गया। पुलिस की धमकियों के डर से कर्मचारी भाग गए और उनकी 54 कीमती भैंसें चारे के अभाव में तड़प-तड़प कर मर गईं। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जेल से ही मानवाधिकार आयोग को अपनी आपबीती लिखते रहे।
1997 में मिली पहली राहत: कोर्ट ने किया बाइज्जत बरी और दोषी पुलिस वालों पर ठोंका जुर्माना
दो दिन की पुलिस रिमांड और 891 दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारने के बाद, साल 1997 में दुर्ग कोर्ट ने प्रदीप जैन को दोनों मामलों में निर्दोष पाते हुए बरी कर दिया। अदालत ने न केवल उन्हें रिहा किया, बल्कि झूठा केस बनाने वाले पुलिस अधिकारियों की जमकर खिंचाई की। कोर्ट ने दोषी पुलिस वालों पर मुकदमा चलाने और उन पर 1000 रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश दिया। अपनी गर्दन फंसती देख पुलिस वालों ने कोर्ट में अपना जुर्म कबूल कर लिया और जुर्माने की राशि जमा कर दी। हालांकि, यह न्याय की महज शुरुआत थी।
मुआवजे की लंबी कानूनी लड़ाई: हाईकोर्ट ने सुनाया 13.60 लाख का फैसला, सरकार को दी चेतावनी
बरी होने के बाद प्रदीप जैन ने सवाल उठाया कि उनकी बर्बादी और मानसिक उत्पीड़न की भरपाई कौन करेगा? निचली अदालत से राहत न मिलने पर वे बिलासपुर हाईकोर्ट पहुंचे। सालों की कानूनी जद्दोजहद के बाद 23 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने शासन को आदेश दिया कि प्रदीप जैन को 5 लाख रुपये मुआवजे की मूल राशि पर ब्याज जोड़कर कुल 13 लाख 60 हजार रुपये का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि चूंकि पुलिस वालों से वसूली में देरी हो सकती है, इसलिए राज्य सरकार यह राशि तुरंत अदा करे।
कलेक्टर की कुर्सी पर मंडराया खतरा: जब कलेक्ट्रेट की संपत्ति कुर्क करने वकील के साथ पहुंचे प्रदीप
हाईकोर्ट के आदेश के 60 दिन बाद भी जब सरकार ने भुगतान नहीं किया, तो प्रदीप जैन ने एक साहसिक कदम उठाया। उन्होंने अदालत से सरकारी संपत्ति कुर्क करने की अनुमति मांगी और अपने वकील के साथ कलेक्ट्रेट पहुंच गए। दफ्तर का सामान और गाड़ियां कुर्क होने के डर से प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह को खुद डिस्ट्रिक्ट जज की शरण लेनी पड़ी और भुगतान के लिए कुछ दिनों की मोहलत मांगी। व्यवस्था की इस लाचारी ने साबित कर दिया कि एक आम आदमी का संघर्ष बड़े से बड़े अधिकारी को भी झुकने पर मजबूर कर सकता है।
31 साल बाद मिली मामूली राशि: दोषी थानेदार से हुई वसूली, लेकिन तब तक उजड़ चुका था संसार
आखिरकार 17 दिसंबर 2025 को कलेक्टर ने मुआवजे की राशि तत्कालीन थाना प्रभारी एम.डी. तिवारी से वसूल कर जिला न्यायालय में जमा कराई। हालांकि, यह न्याय बहुत देर से आया। इन 31 सालों में प्रदीप जैन की पत्नी का हार्ट अटैक से निधन हो गया और उनकी सारी संपत्ति केस लड़ने की भेंट चढ़ गई। जो व्यक्ति कभी करोड़ों का मालिक था, आज वह खुद चल-फिर पाने में भी असमर्थ है। शासन ने महज 13.60 लाख रुपये देकर अपना पल्ला झाड़ लिया, जो उनके द्वारा खोए गए वैभव और सम्मान की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
दान करेंगे मुआवजे का पैसा: बीमार और असहाय होने के बावजूद नहीं टूटा स्वाभिमान
प्रदीप जैन का कहना है कि उन्हें यह मामूली राशि अपने नुकसान की भरपाई के तौर पर मंजूर नहीं है। उन्होंने फैसला किया है कि वे इस मुआवजे की पाई-पाई शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली किसी नेक संस्था को दान कर देंगे। उनका कहना है कि उन्होंने यह लड़ाई पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपने सम्मान और पुलिस की तानाशाही के खिलाफ लड़ी थी। आज वे शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हैं, लेकिन उनके भीतर का पत्रकार और संघर्षी नागरिक अभी भी जीवित है।
अगली मंजिल सुप्रीम कोर्ट: न्याय व्यवस्था और पुलिसिया दमन के खिलाफ फिर खोलेंगे मोर्चा
प्रदीप जैन इस अधूरे न्याय से संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है कि शासन और पुलिस ने मिलकर उनके जीवन के सबसे कीमती साल छीन लिए। अब वे अपने स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार होते ही इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके मामले को एक मिसाल बनाया जाए ताकि भविष्य में कोई पुलिस अधिकारी किसी बेगुनाह नागरिक की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके। उनकी यह जिद छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिसिया गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।



