
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में बुधवार को ‘राष्ट्रीय जंबूरी’ के आयोजन में हुए कथित भ्रष्टाचार को लेकर सदन अखाड़ा बन गया। प्रश्नकाल की शुरुआत होते ही कांग्रेस विधायकों ने सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया कि स्काउट-गाइड के इस बड़े आयोजन की आड़ में नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं। विपक्ष ने इस पूरे मामले की जांच विधानसभा की विशेष समिति से कराने की मांग की, लेकिन स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के इनकार के बाद सदन में भारी हंगामा हुआ और नाराज कांग्रेसी सदस्यों ने नारेबाजी करते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया।
टेंडर की ‘जादूगरी’: बिना वर्क ऑर्डर शुरू हुआ काम?
कांग्रेस विधायक राघवेंद्र सिंह ने सदन में दस्तावेजों का हवाला देते हुए सनसनीखेज आरोप लगाया कि जंबूरी के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही ग्राउंड पर काम शुरू कर दिया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किस रसूखदार के इशारे पर सरकारी नियमों को दरकिनार कर ठेकेदारों को फायदा पहुँचाया गया? विधायक ने तारीखों का झोल उजागर करते हुए बताया कि पहला टेंडर 10 दिसंबर 2025 को निकाला गया, जिसे अचानक निरस्त कर 23 दिसंबर को दूसरा टेंडर जारी किया गया। इस देरी और बदलाव के पीछे मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए गए।
मानकों में कटौती: 90 से सीधे 52 पर कैसे आए बिंदु?
भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच एक और बड़ा खुलासा हुआ कि जंबूरी आयोजन के लिए जो 90 मानक बिंदु (Quality Points) तय किए गए थे, उन्हें घटाकर सीधे 52 कर दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि गुणवत्ता के साथ यह समझौता केवल चहेते वेंडर्स को उपकृत करने के लिए किया गया। राघवेंद्र सिंह ने पूछा कि आखिर किसकी मिलीभगत से इन मानकों को कम किया गया और क्या इससे आयोजन की गरिमा और सुरक्षा पर असर नहीं पड़ा? इस मुद्दे पर सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
शिक्षा मंत्री का पलटवार: “सब नियमों के दायरे में हुआ”
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि जंबूरी का आयोजन पूरी पारदर्शिता के साथ बालोद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) की देखरेख में संपन्न हुआ है। उन्होंने भ्रष्टाचार के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि स्थल का चयन राष्ट्रीय मुख्यालय दिल्ली के निर्देशों के आधार पर ही किया गया था। मंत्री ने जोर देकर कहा कि पूरी राशि का व्यय ‘छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम’ के तहत ही हुआ है, इसलिए अलग से किसी जांच की कोई आवश्यकता नहीं है।
बालोद बनाम रायपुर: आयोजन स्थल पर भी रार
जंबूरी के आयोजन स्थल को लेकर भी सदन में सवाल गूंजे। विपक्ष का दावा है कि पहले यह आयोजन रायपुर में होना प्रस्तावित था, लेकिन अंतिम समय में इसे बालोद शिफ्ट कर दिया गया। विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि क्रियान्वयन एजेंसी ने अपनी सुविधा और कमीशनखोरी के लिए स्थल परिवर्तन का खेल खेला। नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि अगर सरकार पाक-साफ है, तो दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए विधानसभा की जांच समिति बनाने से पीछे क्यों हट रही है?
जांच से इनकार और विपक्ष का ‘मैदान छोड़’ प्रदर्शन
जब मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि विभाग की ओर से कोई अनियमितता नहीं हुई है और सरकार किसी भी तरह की संसदीय जांच समिति नहीं बनाएगी, तो सदन में शोर-शराबा बढ़ गया। कांग्रेस विधायकों ने आरोप लगाया कि सरकार भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। जांच की मांग ठुकराए जाने से नाराज होकर पूरी कांग्रेस पार्टी ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया और नारेबाजी करते हुए बाहर निकल गई। विपक्ष का कहना है कि वे इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाएंगे।
करोड़ों के खर्च पर उठे सवाल: क्या होगी रिकवरी?
विपक्ष ने यह भी पूछा कि जंबूरी के लिए आवंटित कुल बजट में से कितनी राशि खर्च हुई और कितनी शेष है। आरोप है कि टेंट, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं के नाम पर करोड़ों रुपये के फर्जी देयक (Bills) प्रस्तुत किए गए हैं। हालांकि, मंत्री ने सदन को भरोसा दिलाया कि हर एक पैसे का ऑडिट कराया जाएगा, लेकिन विपक्ष जांच की प्रक्रिया पर ही सवाल उठा रहा है। इस खींचतान के बीच जंबूरी का यह विवाद अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
विधानसभा की गरिमा और भ्रष्टाचार के आरोप
बुधवार की कार्यवाही ने यह साफ कर दिया कि बजट सत्र के आने वाले दिन और भी हंगामेदार हो सकते हैं। एक तरफ जहां सरकार इसे सफल आयोजन बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘करोड़ों का जंबूरी घोटाला’ करार दे रहा है। जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है कि क्या वाकई टेंडर से पहले काम शुरू हुआ था या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी है? अब देखना होगा कि सदन के बाहर यह विवाद क्या मोड़ लेता है।
क्या आप यह जानना चाहते हैं कि जंबूरी आयोजन के दौरान ठेकेदारों को किए गए भुगतान और टेंडर की शर्तों की विस्तृत रिपोर्ट ऑनलाइन कहां देखी जा सकती है?



