छत्तीसगढ़ में ‘फर्जी निवास’ का खेल: दूसरे राज्यों के युवा छीन रहे स्थानीय नौकरियां, इस जिले में हुआ बड़ा खुलासा

छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी से जूझ रहे स्थानीय युवाओं के लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। सरकारी नौकरियों में प्रदेश के युवाओं के लिए आरक्षित कोटे पर अब दूसरे राज्यों के अभ्यर्थी फर्जी तरीके से कब्जा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से आने वाले युवा छत्तीसगढ़ का फर्जी निवास प्रमाण पत्र बनवाकर यहां के कोटे की केंद्र सरकार की नौकरियां हासिल कर रहे हैं। इस गंभीर जालसाजी के खिलाफ अब आक्रोश बढ़ने लगा है और राजनांदगांव जिले में एसएससी-जीडी (SSC-GD) की परीक्षा देने वाले स्थानीय अभ्यर्थियों ने प्रशासन से इसकी लिखित शिकायत की है।

आधार कार्ड के जरिए बुना जा रहा फर्जीवाड़े का जाल

दस्तावेजों में हेराफेरी का तरीका बेहद शातिराना है। शिकायतकर्ता अभ्यर्थियों के अनुसार, बाहरी राज्यों के युवा सबसे पहले स्थानीय जनप्रतिनिधियों जैसे पार्षद या सरपंच की मिलीभगत से अपने आधार कार्ड में पता बदलवा लेते हैं। एक बार आधार कार्ड पर छत्तीसगढ़ का पता दर्ज होने के बाद, वे आसानी से अपना वोटर आईडी कार्ड बनवाते हैं और फिर इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर ‘स्थानीय निवास प्रमाण पत्र’ हासिल कर लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का इस्तेमाल केवल छत्तीसगढ़ के कम कट-ऑफ का फायदा उठाने के लिए किया जा रहा है।

डाकघर पहुंच रहे सीधे जॉइनिंग लेटर लेने

इस फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा सुराग तब मिला जब नियुक्तियों के जॉइनिंग लेटर डाक के जरिए पते पर पहुंचने शुरू हुए। बताया जा रहा है कि कई मामलों में जब डाकिया पत्र लेकर दिए गए पते पर पहुंचता है, तो वहां संबंधित व्यक्ति का कोई नामो-निशान नहीं मिलता। ऐसे में ये फर्जी अभ्यर्थी सीधे डाकघर पहुंचकर अपना लेटर लेने की कोशिश करते हैं। कुछ मामलों में तो डाक विभाग ने पते की पुष्टि न होने पर जॉइनिंग लेटर्स को वापस प्रेषक (Sender) को लौटा दिया है, जिससे यह साफ हो गया है कि कागजों पर दिया गया पता पूरी तरह फर्जी था।

नक्सल प्रभावित इलाकों के कोटे पर नजर

एसएससी-जीडी भर्ती के तहत छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से सीटें आरक्षित की जाती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए 1124 पुरुष और 124 महिला पद आरक्षित थे। वहीं सामान्य कोटे में 490 पुरुष और 54 महिला पद थे। इन सीटों पर बीएसएफ, सीआईएसएफ और आईटीबीपी जैसे अर्धसैनिक बलों में भर्ती होनी है। बाहरी राज्यों के युवा जानते हैं कि छत्तीसगढ़ का कट-ऑफ उनके मूल राज्यों के मुकाबले काफी कम रहता है, इसलिए वे फर्जीवाड़े का सहारा लेकर इन आरक्षित सीटों को हथिया रहे हैं।

राजनांदगांव में आधा दर्जन से अधिक संदिग्धों की पहचान

जागरूक अभ्यर्थियों ने राजनांदगांव जिले में सक्रियता दिखाते हुए करीब आधा दर्जन ऐसे लोगों की पहचान की है, जो मूल रूप से बाहरी राज्यों के हैं लेकिन यहां के कोटे से चयनित हुए हैं। अभ्यर्थियों ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इन नियुक्तियों पर रोक लगाने और दस्तावेजों की दोबारा जांच करने की मांग की है। स्थानीय युवाओं का कहना है कि अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो प्रदेश के हजारों होनहार युवाओं का भविष्य अंधकार में चला जाएगा और उनके हिस्से का रोजगार बाहरी लोग ले जाएंगे।

प्रशासन ने कहा: पुख्ता दस्तावेज मिलने पर होगी जांच

इस मामले पर प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वे शिकायतों को गंभीरता से ले रहे हैं। अपर कलेक्टर प्रेमप्रकाश शर्मा के मुताबिक, संबंधित व्यक्ति के चयन और उसके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच तभी संभव है जब नियोक्ता विभाग या कोई शिकायतकर्ता साक्ष्यों के साथ आधिकारिक शिकायत दर्ज कराए। प्रशासन ने शिकायत करने वाले युवाओं से कहा है कि वे चयनित संदिग्धों की सूची और उनके फर्जी होने के प्राथमिक सबूत पेश करें, ताकि मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू की जा सके और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई हो सके।

कम कट-ऑफ का फायदा उठाने की सोची-समझी साजिश

पूरी भर्ती प्रक्रिया का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि यह एक सोची-समझी साजिश है। पिछले साल नवंबर-दिसंबर में आयोजित एसएससी-जीडी परीक्षा के बाद जब राज्यवार कट-ऑफ जारी हुआ, तो छत्तीसगढ़ का ग्राफ अन्य राज्यों की तुलना में काफी नीचे था। इसी अंतर का लाभ लेने के लिए बाहरी राज्यों के गिरोह सक्रिय हुए और फर्जी निवास प्रमाण पत्रों की फैक्ट्री चलानी शुरू कर दी। इसका सीधा नुकसान छत्तीसगढ़ के उन मूल निवासी युवाओं को हो रहा है जो दिन-रात मेहनत करके वर्दी पहनने का सपना देख रहे हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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