
दुर्ग: छत्तीसगढ़ में पुलिस की मनमानी और पद के दुरुपयोग का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो कानून के इतिहास में नजीर बन गया है। भिलाई के एक व्यापारी प्रदीप जैन को करीब 33 साल पहले आत्महत्या के झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजा गया था। तीन दशक से ज्यादा चली इस कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार न्याय की जीत हुई है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने न केवल व्यापारी को बाइज्जत बरी किया, बल्कि पुलिस की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण मानते हुए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। इस मामले की सबसे बड़ी बात यह है कि हर्जाने की पूरी राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी अधिकारी की जेब से वसूली गई है।
993 दिन जेल और तबाह हुआ व्यापार: 1992 की उस काली रात की कहानी
यह दर्दनाक मामला साल 1992 का है, जब प्रदीप जैन भिलाई में साइकिल दुकान और दूध डेयरी चलाते थे। उनके छोटे भाई की पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी, जिसके बाद तत्कालीन थाना प्रभारी (TI) एमडी तिवारी ने प्रदीप को मुख्य आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। व्यापारी को आर्थिक रूप से तोड़ने के लिए उनकी डेयरी को ध्वस्त कर दिया गया और वहां बंधी 35 भैंसों को बेसहारा छोड़ दिया गया। प्रदीप जैन को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए 993 दिन यानी करीब 3 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताने पड़े। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने हार नहीं मानी और पुलिस की ज्यादती के खिलाफ लंबी कानूनी जंग शुरू की।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: अधिकारी की संपत्ति कुर्क कर वसूली गई रकम
बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से सुनवाई करते हुए पाया कि पुलिस ने पूरी कार्रवाई द्वेष और दुर्भावना के तहत की थी। कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि जब कोई अधिकारी अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करता है, तो हर्जाने की राशि उसी से वसूली जानी चाहिए। इसके बाद प्रशासन ने तत्कालीन टीआई एमडी तिवारी की संपत्तियों की जांच शुरू कर दी। जब उनकी संपत्ति की कुर्की और नीलामी की तैयारी हुई, तो दबाव में आकर पूर्व अधिकारी ने 13.40 लाख रुपये का डिमांड ड्राफ्ट तहसीलदार के पास जमा किया। 17 दिसंबर को यह राशि कोर्ट में जमा करा दी गई, जिससे अब पीड़ित को मुआवजा मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
अधिकारी के रसूख पर भारी पड़ा कानून: नीलामी से पहले जमा करना पड़ा ड्राफ्ट
दुर्ग कलेक्टर के निर्देश पर जब बिलासपुर प्रशासन ने टीआई की संपत्तियों को चिन्हित कर नीलामी की प्रक्रिया शुरू की, तब जाकर अधिकारी का रसूख ढीला पड़ा। 33 साल तक जिस सिस्टम के दम पर पीड़ित को डराया गया, उसी सिस्टम ने अंततः दोषी को सजा दी। पीड़ित के वकील सुधीर पांडे ने बताया कि यह केवल पैसों की बात नहीं है, बल्कि उस खोए हुए सम्मान और मानसिक प्रताड़ना का हिसाब है जो प्रदीप जैन ने दशकों तक झेला है। टीआई द्वारा जमा की गई 13.40 लाख रुपये की यह राशि ब्याज सहित हर्जाने के तौर पर दी गई है, जो पुलिस विभाग के अन्य अधिकारियों के लिए एक कड़ा सबक है।
नजीर बनेगा यह फैसला: आम आदमी के भरोसे की जीत
कानून के जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन पुलिसकर्मियों के लिए चेतावनी है जो अपनी वर्दी के रसूख में आकर किसी निर्दोष का जीवन बर्बाद कर देते हैं। जिला प्रशासन की ओर से पैरवी कर रहे वकील गिरीश शर्मा ने कहा कि पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में यह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा बड़ा मामला है जहां सीधे अधिकारी की जेब से वसूली की गई है। यह मामला साबित करता है कि न्याय मिलने में देरी भले ही हो सकती है, लेकिन कानून की नजर से कोई भी दोषी बच नहीं सकता। 33 साल बाद मिला यह इंसाफ आज उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो सिस्टम के अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं।



