
रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में ‘छेरछेरा’ का विशेष स्थान है। यह त्योहार हर साल पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। मूलतः यह फसल कटाई के बाद खुशी मनाने का उत्सव है, जिसे किसान अपनी कड़ी मेहनत का फल घर आने के उल्लास में मनाते हैं। साल 2026 में यह महापर्व जनवरी की शुरुआत में ही पड़ रहा है। इस दिन पूरे प्रदेश में ‘दान’ की अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और अन्न का दान मांगते हैं। मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति खुले दिल से दान करता है, उसके घर में साल भर बरकत बनी रहती है और समृद्धि के द्वार खुलते हैं।
छेरछेरा 2026 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त: 02 या 03 जनवरी?
कैलेंडर के अनुसार, साल 2026 में पूर्णिमा तिथि 02 जनवरी की शाम से ही शुरू हो जाएगी, लेकिन उदया तिथि के आधार पर छेरछेरा का मुख्य उत्सव 03 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन सुबह से ही गांवों और शहरों में “छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरहेरा” की गूंज सुनाई देने लगेगी। लोग स्नान-ध्यान कर अपनी कुल देवी और देवताओं की पूजा करते हैं और फिर अन्न के भंडार खोल देते हैं।
छेरछेरा पर्व 2026: विशेष समय और तिथि
| व्रत एवं त्योहार | दिनांक और सही समय |
| छेरछेरा पर्व | 03 जनवरी 2026, शनिवार |
| पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ | 02 जनवरी 2026, शाम 06:55 बजे से |
| पूर्णिमा तिथि का समापन | 03 जनवरी 2026, दोपहर 03:44 बजे तक |
पौराणिक महत्व: जब शिव ने माता अन्नपूर्णा से मांगी थी भिक्षा
इस त्योहार का संबंध केवल खेती से नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं से भी जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने धरती पर अन्न के महत्व को समझाने के लिए माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी। माता अन्नपूर्णा ने समस्त संसार के कल्याण के लिए शिव को अन्न दान किया था। तभी से इस दिन को दान का सबसे बड़ा दिन माना जाता है। छत्तीसगढ़ के लोग इस परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए हैं। उनका मानना है कि इस दिन दान देने से उदारता बढ़ती है और दान ग्रहण करने वाले के भीतर से अहंकार का नाश होता है। यह त्योहार सामाजिक समानता का एक बड़ा उदाहरण पेश करता है।
‘छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा’: गूंजेंगे लोकगीत
छेरछेरा के दिन छत्तीसगढ़ की गलियों में एक अलग ही रौनक होती है। बच्चे अपने कंधों पर थैला लटकाए टोलियां बनाकर घर-घर दस्तक देते हैं। वे घर के द्वार पर खड़े होकर बड़े उत्साह से गाते हैं- “छेरछेरा, छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा”। इसका अर्थ है कि घर की मालकिन अपने भंडार (कोठी) से धान निकालकर दान करें। घर के लोग भी उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाते और अपनी शक्ति अनुसार धान, रुपया या सब्जियां दान करते हैं। इस दिन मांगकर जमा किए गए अन्न और धन का उपयोग अक्सर सामाजिक कार्यों या जनकल्याण के लिए भी किया जाता है।
किसानों की मेहनत और खुशहाली का प्रतीक: कोठार से घर तक उत्सव
यह पर्व विशेष रूप से किसानों को समर्पित है। साल भर धूप और बारिश झेलकर जब किसान धान की फसल काटकर सुरक्षित अपने घर ले आते हैं, तब वे मानसिक रूप से निश्चिंत होते हैं। फसल का घर आना संपन्नता का प्रतीक है। छेरछेरा इसी संपन्नता को समाज के साथ बांटने का जरिया है। किसान अपनी फसल का एक हिस्सा दान देकर ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करते हैं। छत्तीसगढ़ में इस दिन घरों में विशेष पकवान जैसे फरा, चीला और चौसेला बनाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं और मिलजुलकर खुशियां मनाते हैं।
सामाजिक एकता और उदारता का संदेश, नई फसल की खुशी और दान
छेरछेरा केवल एक धार्मिक या कृषि उत्सव नहीं है, बल्कि यह समाज को एकजुट करने वाला सूत्र है। इस दिन अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है क्योंकि हर कोई दान मांगने और देने की इस प्रक्रिया में शामिल होता है। यह त्योहार सिखाता है कि जीवन में विनम्रता सबसे ऊपर है। दान करने से इंसान के भीतर त्याग की भावना पैदा होती है। आज के समय में जब सामाजिक दूरियां बढ़ रही हैं, छत्तीसगढ़ का यह पारंपरिक पर्व उदारता और सहृदयता का बड़ा संदेश देता है।
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