62 साल बाद सुलझा कोयला खदान का विवाद, विस्थापितों को मिलेंगे लाखों रुपए मुआवजा और नौकरी में प्राथमिकता

कोरबा जिले की मानिकपुर कोयला खदान के विस्तार में आ रही सबसे बड़ी बाधा अब दूर हो गई है। ग्राम भिलाईखुर्द के भू-विस्थापितों और साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (SECL) के बीच पिछले आठ साल से चला आ रहा गतिरोध आखिरकार खत्म हुआ। प्रबंधन और ग्रामीणों के बीच हुई त्रिपक्षीय वार्ता में यह तय हुआ है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार को 6.78 लाख रुपये का विस्थापन मुआवजा दिया जाएगा। यह समझौता इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह जमीन 62 साल पहले अधिग्रहित की गई थी, लेकिन मुआवजे और विस्थापन की विसंगतियों के कारण ग्रामीण जमीन खाली करने को तैयार नहीं थे।

1964 का अधिग्रहण और बदली हुई परिस्थितियां

मानिकपुर खदान के लिए जमीन का अधिग्रहण साल 1964 में किया गया था। उस समय 14 एकड़ जमीन के बदले केवल 20 हजार रुपये का मुआवजा तय हुआ था। हालांकि, राशि मिलने के बाद भी ग्रामीणों ने जमीन खाली नहीं की और वहीं बसते रहे। अब छह दशक बीतने के बाद विस्थापितों की तीसरी पीढ़ी वहां रह रही है। प्रबंधन जब खदान विस्तार के लिए पहुंचा, तो ग्रामीणों ने पुराने मुआवजे को नाकाफी बताते हुए विरोध शुरू कर दिया। ग्रामीणों का तर्क था कि आज की महंगाई और बदली हुई परिस्थितियों में पुरानी राशि का कोई मोल नहीं रह गया है।

मंत्री की पहल पर बनी सहमति

इस पेचीदा मामले को सुलझाने में प्रदेश के उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन ने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने एसईसीएल अधिकारियों और प्रशासन के साथ बैठक में स्पष्ट किया कि इतने सालों बाद बिना उचित बसाहट और शिफ्टिंग मुआवजे के जमीन खाली करवाना गलत होगा। मंत्री ने सुझाव दिया कि केवल मूल जमीन मालिक के बजाय अब वहां रह रहे हर परिवार को इकाई मानकर मुआवजा दिया जाए। प्रबंधन इस प्रस्ताव पर राजी हो गया, जिसके बाद विस्थापन के लिए 6.78 लाख रुपये प्रति परिवार देने की घोषणा की गई।

नौकरी और रोजगार में मिलेगी प्राथमिकता

केवल नकद मुआवजे तक ही यह समझौता सीमित नहीं है। वार्ता में इस बात पर भी सहमति बनी है कि मानिकपुर खदान में काम करने वाली आउटसोर्सिंग कंपनियों में भू-विस्थापित परिवारों के सदस्यों को नौकरी में प्राथमिकता दी जाएगी। खदान विस्तार से क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और प्रभावित परिवारों को आर्थिक स्थिरता मिलेगी। इस निर्णय से उन युवाओं में खुशी है जो लंबे समय से खदान के कारण अपनी जमीन गंवाने के बाद बेरोजगारी का सामना कर रहे थे।

खदान विस्तार और कोयला उत्पादन का लक्ष्य

भिलाईखुर्द की करीब ढाई सौ एकड़ जमीन मिलने से एसईसीएल के लिए अपने उत्पादन लक्ष्यों को हासिल करना आसान हो जाएगा। मानिकपुर खदान ने पिछले वित्त वर्ष में करीब 52.50 लाख टन कोयले का उत्पादन किया था और लगातार 11 वर्षों से अपना रिकॉर्ड बेहतर कर रही है। इस साल खदान के लिए 83.65 लाख टन का भारी-भरकम लक्ष्य रखा गया है। नई जमीन मिलने के बाद कोयले का उत्खनन तेज हो सकेगा, जिससे न केवल कंपनी को फायदा होगा बल्कि राज्य के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी।

जल्द शुरू होगी भुगतान की प्रक्रिया

जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि मुआवजे की राशि का बारीकी से आकलन कर जल्द ही वितरण प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इसके लिए प्रभावित परिवारों की नई सूची तैयार की जा रही है ताकि वास्तविक हकदारों को उनका लाभ मिल सके। रायगढ़ जैसी हिंसक घटनाओं से सबक लेते हुए प्रशासन इस बार पूरी सावधानी बरत रहा है। ग्रामीणों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि विस्थापन के बाद उन्हें मिलने वाली नई बसाहट में बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, पानी और सड़क की पुख्ता व्यवस्था होगी।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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