CG Ministry New Rule: मंत्रालय में रंगों का खेल: अलग-अलग रंगों वाले अब ID कार्ड से मिलेगी एंट्री, गले का फीता बताएगा कर्मचारियों की पहचान

रायपुर। CG Ministry New Rule: छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर का मंत्रालय अब सिर्फ नीतियों का अड्डा नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे फीते का रनिंग रैंप बन गया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने एक ऐसा नया फरमान जारी किया है, जिससे मंत्रालय की गलियों में अब सिर्फ फाइलें नहीं दौड़ेंगी, बल्कि रंगों की सियासत भी दौड़ेगी। आदेश के मुताबिक अब हर अधिकारी-कर्मचारी के गले में लटकने वाला फीता उनके रुतबे का रंग तय करेगा।

आईडी कार्ड में टेक्नोलॉजी से ज़्यादा रंग का जलवा

ID Card Controversy: नए परिचय पत्र अब हाईटेक होंगे—RFID, QR कोड और होलोग्राम जैसे सुरक्षा फीचर्स से लैस। लेकिन असल चर्चा फीते के रंगों की है। कौन पीला? कौन नीला? और कौन सफेद? यही रंग अब बताएँगे कि आप ‘सरकारी परिवार’ के कितने खास सदस्य हैं।

कौन किस रंग में?

  • पीला फीता: नियमित सरकारी कर्मचारी और मंत्रालय के अधिकारी
  • नीला फीता: मंत्रालय के बाहर के शासकीय विभागों से आए कर्मचारी
  • सफेद फीता: गैर-शासकीय या अस्थायी कर्मी

अब फीते से तय होगी पहचान, रुतबा और शायद… मेन्यू भी!

Color Coded Access: कल्पना कीजिए, आप मंत्रालय की कैंटीन में खड़े हैं और कोई आपको देखकर कहता है—”सफेद फीता? बस चाय लो भाई, बिरयानी पीले वालों की है!” अब लिफ्ट तक में बंटवारा शुरू हो गया है। ऊपर जाने का टिकट भी शायद अब फीते का रंग होगा।

साफ फर्क, साफ भेदभाव

कर्मचारी संगठनों ने इस आदेश पर सख्त ऐतराज़ जताया है। अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष कमल वर्मा का कहना है, “हम आईडी कार्ड का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि फीते के रंग के खिलाफ हैं। इससे कर्मचारियों के बीच भेदभाव पैदा होगा।”

संचालनालय कर्मचारी संघ के जय कुमार साहू ने भी चेताया—“रंगों से लोगों के मन में हीन भावना पनपेगी। ये व्यवस्था किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं।”

फीते के रंग से पहचान? रिटायरमेंट के बाद फीता भी बेस्वाद

CG Government Employees: सबसे ज्यादा अफसोसजनक बात ये कि रिटायर्ड अफसरों के फीते से न तो ‘छत्तीसगढ़ शासन’ का लोगो रहेगा, न ही विभाग का नाम। जैसे रिटायरमेंट के साथ उनकी पहचान भी सिस्टम से मिटा दी गई हो। ये सिर्फ पहचान पत्र नहीं, बल्कि इज्जत का तमगा बन गए हैं।

फीते से तय नौकरशाही का ‘फैशन स्टेटमेंट’

मंत्रालय का माहौल अब किसी फैशन शो जैसा है। गलियों में चलती फाइलों की जगह अब लोग गले की रस्सी—माफ कीजिए, फीता—देखकर फैसला कर रहे हैं कि कौन कितना बड़ा आदमी है।

कागज़ी कार्यवाही और फीते की ‘फॉर्मेलिटी’

परिचय पत्र बनवाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं। पहले पोर्टल में जानकारी भरनी होगी, फिर सत्यापन, फिर फॉरवर्डिंग, फिर रजिस्ट्रार शाखा। नियमित कर्मचारियों को 5 साल का स्थायी कार्ड मिलेगा, जबकि बाकी को सिर्फ 1 साल का टेम्पररी पास। मतलब—सरकारी भी हो तो “अभी पीला नहीं हुआ बेटा।”

कर्मचारी संगठनों की चेतावनी: रंग नहीं बदला, तो आंदोलन तय

महेंद्र सिंह राजपूत, अध्यक्ष मंत्रालयीन कर्मचारी संघ, कहते हैं—“फीते से पहचान तय करना पूरी तरह से गैरबराबरी है। अब तो लोग फीते देखकर चपरासी या अफसर कहने लगे हैं। ये असली ‘कलर डिस्क्रिमिनेशन’ है।”

तीनों कर्मचारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर सभी के फीते का रंग एक समान नहीं रखा गया, तो वे चरणबद्ध आंदोलन की राह पर उतरेंगे।

फीते में सजा सिस्टम, रंगों में बंटती पहचान

सरकारी दफ्तरों में नई पहचान बनी है—कौन कितना अफसर है, अब वो नाम से नहीं, गले से लटकते फीते से तय होगा। कोई पीले पर इठलाएगा, कोई नीले में उम्मीद लगाएगा, और सफेद? वो सिर्फ ‘गेट पास’ बनकर रह जाएगा। मंत्रालय अब सिर्फ नीति नहीं, नज़ारा भी बन चुका है—जहाँ हर कदम पर रंग बोलते हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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