
छत्तीसगढ़ में सुशासन के बड़े दावों के बीच जन शिकायत निवारण पोर्टल की जमीनी हकीकत काफी अलग नजर आ रही है। सरकार ने जनता की समस्याओं के तत्काल समाधान के लिए जन शिकायत निवारण पोर्टल तो बना दिया, लेकिन अब यह व्यवस्था भारी-भरकम फाइलों के बोझ तले दबी महसूस हो रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में शिकायतों के निराकरण की रफ्तार उम्मीद से कहीं ज्यादा सुस्त है, जिससे लोगों का भरोसा इस तंत्र से धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
हर छठे शिकायतकर्ता को समाधान का इंतजार
राज्य में जन शिकायतों की पेंडेंसी का आंकड़ा चौंकाने वाला है। पोर्टल पर अब तक कुल 2 लाख 15 हजार 615 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 36 हजार 314 आवेदन आज भी लंबित हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि सिस्टम तक पहुंचने वाला हर छठा व्यक्ति अब भी जवाब की राह देख रहा है। शिकायतों का निपटारा समय पर न होने से पोर्टल का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है।
डिजिटल इंडिया पर भारी पड़ती कागजी शिकायतें
हैरानी की बात यह है कि आज के डिजिटल युग में भी डाक से आने वाली शिकायतें सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि कुल लंबित आवेदनों में से 30,369 शिकायतें डाक के जरिए भेजी गई हैं, जबकि ऑनलाइन पोर्टल की लंबित शिकायतों की संख्या 6,099 है। यह आंकड़ा बताता है कि कागजी आवेदनों को सुलझाने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं।
जिलावार पेंडेंसी: बेमेतरा और बिलासपुर में बुरा हाल
जन शिकायतों के निराकरण के मामले में अलग-अलग जिलों की स्थिति भिन्न है। जहां नारायणपुर और दंतेवाड़ा जैसे दूरस्थ जिलों में लंबित मामलों की संख्या काफी कम है, वहीं बेमेतरा, बिलासपुर और दुर्ग जैसे विकसित जिलों में शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। बेमेतरा जिला 737 लंबित आवेदनों के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जो स्थानीय प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
छत्तीसगढ़ के इन जिलों में लंबित शिकायतों का विवरण
| स. क्र. | जिले का नाम | लंबित शिकायतों की संख्या |
| 1 | सक्ती | 70 |
| 2 | सूरजपुर | 71 |
| 3 | धमतरी | 75 |
| 4 | बलौदाबाजार-भाटापारा | 79 |
| 5 | जशपुर | 84 |
| 6 | सारंगढ़-बिलाईगढ़ | 93 |
| 7 | बालोद | 98 |
| 8 | जांजगीर-चांपा | 108 |
| 9 | कबीरधाम | 110 |
| 10 | रायगढ़ | 120 |
| 11 | महासमुंद | 132 |
| 12 | कोरबा | 143 |
| 13 | सरगुजा | 443 |
| 14 | दुर्ग | 517 |
| 15 | बिलासपुर | 563 |
| 16 | बेमेतरा | 737 |
यहां सबसे कम शिकायतें लंबित:
| स. क्र. | जिले का नाम | लंबित शिकायतों की संख्या |
| 1 | नारायणपुर | 19 |
| 2 | दंतेवाड़ा | 21 |
| 3 | कोरिया | 25 |
| 4 | सुकमा | 25 |
| 5 | गौरेला-पेंड्रा-मरवाही | 29 |
| 6 | गरियाबंद | 34 |
पोर्टल का उद्देश्य और वर्तमान विडंबना
जन शिकायत निवारण पोर्टल को इसलिए शुरू किया गया था ताकि आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और उसकी समस्या का घर बैठे समाधान हो सके। लेकिन वर्तमान में यह पोर्टल खुद ही सुधार की मांग कर रहा है। विडंबना यह है कि शिकायत दर्ज कराना तो अब बेहद आसान हो गया है, मगर उसका सार्थक हल मिलना आज भी उतना ही कठिन बना हुआ है। कई आवेदकों को तो महीनों तक यह भी पता नहीं चलता कि उनकी फाइल किस मेज पर धूल खा रही है।
जवाबदेही और प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल
पेंडिंग शिकायतों का बढ़ता ग्राफ सीधे तौर पर अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाता है। विभागीय स्तर पर डाक से आने वाले आवेदनों को प्राथमिकता देने के सख्त निर्देश हैं, लेकिन धरातल पर इनका पालन होता नहीं दिख रहा। विपक्ष इसे सुशासन की विफलता बता रहा है, वहीं आम जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या शिकायतों का यह अंबार कभी खत्म होगा या फाइलें यूं ही अलमारियों में बंद रहेंगी।
भविष्य की राह: क्या होगा अगला कदम?
अब सबकी निगाहें शासन के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या इन 36 हजार लंबित शिकायतों को निपटाने के लिए कोई विशेष अभियान चलाया जाएगा या फिर यह कतार और लंबी होती जाएगी? सुशासन तभी सार्थक होगा जब अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की शिकायत का न केवल रिकॉर्ड रखा जाए, बल्कि उसे समय पर न्याय और राहत भी मिले।



