
जब पूरी दुनिया फाल्गुन के उल्लास में रंगों और गुलाल से सराबोर रहती है, तब छत्तीसगढ़ के दुर्ग संभाग का एक गाँव भक्ति की गहरी शांति में डूबा रहता है। दुर्ग जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित ‘चंदनबिरही’ गाँव की कहानी बेहद अनोखी है। यहाँ वर्ष 1926 से लेकर आज तक ग्रामीणों ने कभी होली का हुड़दंग नहीं किया। इस साल गाँव अपनी इस अनोखी परंपरा का 100वाँ साल मना रहा है। जहाँ अन्य जगहों पर नगाड़ों की थाप सुनाई देती है, वहीं चंदनबिरही में राम नाम का अखंड कीर्तन गूँजता है।
बच्चों की अकाल मृत्यु ने बदल दी गाँव की तकदीर
बुजुर्गों की मानें तो 1926 से पहले इस गाँव में फाल्गुन का महीना खुशियों के बजाय मातम लेकर आता था। उस दौरान गाँव में रहस्यमयी तरीके से छोटे बच्चों की अकाल मृत्यु होने लगी थी। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि जिस घर में छोटे बच्चे होते, वे महिलाएँ फाल्गुन शुरू होते ही डर के मारे अपने मायके चली जाती थीं। गाँव पर आए इस संकट को देख तत्कालीन गुंडरदेही रियासत के राजा ठाकुर निहाल सिंह ने ग्रामीणों को एक सलाह दी। उन्होंने सुझाव दिया कि होली के हुड़दंग को त्याग कर गाँव की रक्षा के लिए ईश्वर की शरण में जाया जाए।
राजा की सलाह पर शुरू हुआ ‘रामसत्ता’ का पाठ
राजा निहाल सिंह के सुझाव पर ग्रामीणों ने होली न मनाने और उसके बदले ‘रामसप्ताह’ (अखंड रामसत्ता) आयोजित करने का संकल्प लिया। गाँव के प्राचीन माता बगदई मंदिर प्रांगण में सात दिनों तक चलने वाले 24 घंटे के अखंड कीर्तन की शुरुआत हुई। आश्चर्यजनक रूप से इसके बाद गाँव में बच्चों की अकाल मृत्यु का सिलसिला थम गया। तब से लेकर आज तक चंदनबिरही के लोगों के लिए आस्था का यह रंग दुनिया के किसी भी अबीर-गुलाल से कहीं ज्यादा गहरा हो गया है।
7 दिन और 24 घंटे गूँजता है अखंड राम नाम
चंदनबिरही में रामसप्ताह का आयोजन होली से तीन दिन पहले शुरू होता है और होली के चार दिन बाद तक चलता है। इस दौरान सातों दिन और चौबीस घंटे बिना रुके राम नाम का पाठ किया जाता है। गाँव के जगदीश यादव बताते हैं कि इस उत्सव में केवल चंदनबिरही ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गाँवों की टोलियाँ भी शामिल होती हैं। पूरा गाँव इस समय माता बगदई की शरण में रहता है और नई पीढ़ी भी अपने पूर्वजों के इस संकल्प को बड़ी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है।
नई पीढ़ी ने कभी नहीं देखी रंगों वाली होली
इस गाँव में पैदा हुए बच्चों ने कभी पिचकारी नहीं पकड़ी और न ही कभी चेहरे पर रंग लगवाया। गाँव के युवा पंकज कुमार बताते हैं कि उन्होंने कभी गाँव की गलियों में होली का नगाड़ा बजते नहीं देखा। ग्रामीणों को इस बात का कोई दुख नहीं है कि वे होली नहीं खेलते, बल्कि उन्हें गर्व है कि उनका गाँव भक्ति के इस अनूठे मार्ग पर चल रहा है। यहाँ के लोग आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी अपनी सदियों पुरानी मर्यादा को टूटने नहीं देते।
दहीलूट: यहाँ की प्रतीकात्मक और पवित्र होली
भले ही यहाँ रंगों की होली न होती हो, लेकिन उत्सव का समापन बेहद खास होता है। रामसप्ताह के छठे दिन गाँव में ‘दहीलूट’ का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इसी दिन लोग प्रतीकात्मक रूप से अपने बड़ों के माथे पर तिलक लगाकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यहाँ की होली गुलाल के गुबार में नहीं, बल्कि बड़ों के सम्मान और आपसी भाईचारे में दिखाई देती है। यही वह समय होता है जब पूरा गाँव एक सूत्र में बँधा नजर आता है।
परंपरा के 100वें साल पर विशेष उल्लास
वर्ष 2026 इस गाँव के लिए ऐतिहासिक है क्योंकि इनकी इस अनोखी परंपरा को 100 साल पूरे हो रहे हैं। 1 मार्च से शुरू होने वाले इस शताब्दी वर्ष के रामसप्ताह को लेकर गाँव में जबरदस्त उत्साह है। पूनाराम देवांगन और अन्य ग्रामीण माता बगदई मंदिर परिसर को सजाने और भव्य आयोजन की तैयारियों में जुटे हैं। आज भी चंदनबिरही अपनी इसी अनूठी और मर्यादित परंपरा के कारण पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा और कौतूहल का केंद्र बना हुआ है।



