
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मगरलोड ब्लॉक का एक छोटा सा गांव ‘नारधा’ इन दिनों पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बना हुआ है। यहां के शासकीय प्राथमिक विद्यालय की कायापलट की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी जर्जर हो चुके इस स्कूल भवन ने आज एक आलीशान मॉडल स्कूल का चोला ओढ़ लिया है। इस बदलाव के पीछे किसी सरकारी बजट का भारी-भरकम हाथ नहीं, बल्कि राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक छगन लाल साहू का अटूट जुनून और ग्रामीणों का निस्वार्थ जनसहयोग है। आज इस स्कूल की चमक किसी नामी निजी स्कूल को मात दे रही है।

पांच साल की तपस्या: जब शिक्षक ने संभाली गांव की कमान
नारधा स्कूल का मॉडल स्कूल बनने का सफर रातों-रात तय नहीं हुआ। इसके पीछे प्रधान पाठक छगन लाल साहू की पिछले 5 वर्षों की अनवरत मेहनत छिपी है। साहू ने केवल ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि स्कूल की छुट्टी होने के बाद उनका असली मिशन शुरू होता था। वे हर रोज गांव की गलियों में निकल जाते और घर-घर जाकर अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करते। उनके इसी व्यक्तिगत जुड़ाव ने गांव वालों के मन में वो भरोसा पैदा किया, जिससे जनसहयोग का कारवां खड़ा हो गया।
मेहनत की कमाई से सजा आशियाना: ग्रामीणों ने खुद किया चंदा
शिक्षक के विजन को देखते हुए नारधा के ग्रामीणों ने अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा स्कूल के नाम कर दिया। गांव वालों ने आपसी चंदा इकट्ठा कर स्कूल की जर्जर हालत को सुधारने का बीड़ा उठाया। सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीणों और शिक्षक के तालमेल ने साबित कर दिया कि अगर इरादे नेक हों, तो पत्थर में भी प्राण फूंके जा सकते हैं। आज यह स्कूल जनभागीदारी का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है, जहाँ ग्रामीणों को अपने द्वारा बनाए गए इस शिक्षा के मंदिर पर गर्व महसूस होता है।

देशभक्ति और कला का संगम: दीवारों पर उकेरी गई संस्कृति
स्कूल की चौखट पर कदम रखते ही आपको एक अलग जीवंतता का अनुभव होता है। स्कूल की बाहरी दीवारों पर छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक कला, पर्यावरण संरक्षण के संदेश और देशभक्ति से ओत-प्रोत चित्रकारी की गई है, जो हर आने वाले का मन मोह लेती है। स्कूल के प्रांगण में स्थापित भारत माता की प्रतिमा और नक्सलियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए वीर जवान ललित दीवान की आदमकद मूर्ति बच्चों के कोमल मन में राष्ट्रभक्ति के बीज बो रही है। यहाँ का वातावरण बच्चों को केवल साक्षर ही नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए प्रेरित करता है।
कॉन्वेंट जैसी सुविधाएं: स्मार्ट क्लास से लेकर सुसज्जित लाइब्रेरी तक
यह सरकारी स्कूल आज किसी महंगे प्राइवेट कॉन्वेंट स्कूल से कम नहीं है। जनसहयोग से यहाँ बच्चों के लिए बेहतरीन फर्नीचर, शुद्ध पेयजल के लिए वाटर कूलर और एक सुसज्जित ग्रंथालय (लाइब्रेरी) तैयार किया गया है। आधुनिक स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा ने बच्चों के लिए पढ़ाई को बोझ के बजाय एक रोमांचक अनुभव बना दिया है। गरीब और मजदूर वर्ग के बच्चे अब यहाँ उन्हीं सुविधाओं के बीच पढ़ रहे हैं, जो शहर के बड़े स्कूलों में मिलती हैं।
शिक्षक समुदाय के लिए प्रेरणा: बदली बच्चों की तकदीर
एक शिक्षक की असली सफलता इसी में है कि वह समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े बच्चों को एक उज्जवल भविष्य दे सके। छगन लाल साहू ने न केवल स्कूल की इमारत बदली, बल्कि उन बच्चों की तकदीर बदलने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। नारधा की यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ के समस्त शिक्षक समुदाय के लिए एक बड़ी सीख है। यह कहानी हमें बताती है कि सोच अगर सकारात्मक हो और समाज का साथ मिले, तो सरकारी तंत्र के भीतर रहकर भी विश्वस्तरीय बदलाव संभव है।
जनसहयोग की मिसाल: हर गांव के लिए एक नया संदेश
नारधा का यह मॉडल स्कूल आज हर किसी के लिए चर्चा का विषय है। यहाँ के ग्रामीणों का समर्पण और शिक्षक का विजन आज प्रदेश के हर उस स्कूल के लिए संदेश है जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। शिक्षक और ग्रामवासी की इस साझा सोच ने न केवल स्कूल की तस्वीर बदली है, बल्कि शिक्षा के प्रति पूरे गांव का नजरिया बदल दिया है। नारधा की यह मिसाल अब आसपास के गांवों में भी बदलाव की लहर पैदा कर रही है।
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