‘देसी इंजीनियर’ का कमाल: 9वीं पास आदिवासी युवक ने ने पुरानी बाइक के इंजन से बना डाली लोडर मशीन

सरगुजा: कहते हैं कि हुनर किसी डिग्री या बड़ी यूनिवर्सिटी का मोहताज नहीं होता। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में रहने वाले एक आदिवासी युवक ने इस बात को सच कर दिखाया है। अंबिकापुर के फुन्दूडिहारी निवासी 28 वर्षीय प्रवीण मिंज ने अपनी तकनीकी सूझबूझ से एक ऐसा हाइड्रोलिक लोडर तैयार किया है, जो भारी सामान उठाने और ढोने में सक्षम है। ताज्जुब की बात यह है कि प्रवीण ने केवल 9वीं कक्षा तक पढ़ाई की है, लेकिन उनके बनाए इस ‘जुगाड़ लोडर’ को देखकर बड़े-बड़े इंजीनियर भी हैरान हैं।

बाइक मिस्त्री से आविष्कारक बनने का सफर

प्रवीण पेशे से एक बाइक मैकेनिक हैं और लंबे समय से दोपहिया वाहनों की मरम्मत का काम कर रहे हैं। गाड़ियों के कल-पुर्जों के साथ खेलते-खेलते उनके मन में कुछ नया बनाने का विचार आया। उन्होंने सबसे पहले बाइक के पुराने इंजन का इस्तेमाल कर एक चार पहिया गाड़ी बनाई। जब उन्होंने उस गाड़ी को करीब 1000 किलोमीटर तक चलाकर देख लिया और उन्हें अपनी तकनीक पर पूरा भरोसा हो गया, तब उन्होंने इसमें हाइड्रोलिक सिस्टम जोड़कर इसे एक लोडर का रूप देने का फैसला किया।

कबाड़ और पुराने पार्ट्स से तैयार हुआ लोडर

इस मशीन को बनाने में प्रवीण ने पूरी तरह से पुराने सामानों और कबाड़ का सहारा लिया है। उन्होंने इसमें बाइक के दो इंजन जोड़े हैं ताकि मशीन को पर्याप्त ताकत मिल सके। लोडर के मुख्य हिस्से के लिए उन्होंने ट्रैक्टर का हाइड्रोलिक सिस्टम और बड़े लोडर का पंप इस्तेमाल किया है। इसके अलावा गाड़ी के पहिये और अन्य छोटे हिस्से भी अलग-अलग पुरानी गाड़ियों से निकालकर लगाए गए हैं। प्रवीण ने अपनी इस मशीन में एक कंट्रोल वॉल्व भी लगाया है, जिसकी मदद से इंजन चालू होने पर हाइड्रोलिक सिस्टम को दाएं या बाएं आसानी से घुमाया जा सकता है।

तीन महीने की मेहनत और डेढ़ लाख का खर्च

प्रवीण को इस अनोखे लोडर को तैयार करने में करीब तीन महीने का वक्त लगा। उन्होंने दिन-रात एक करके इसके हर पुर्जे को सेट किया। इस पूरे इनोवेशन में उनका लगभग 1.50 लाख रुपये का खर्च आया है। प्रवीण बताते हैं कि पहली ही कोशिश में उनका यह प्रयोग सफल रहा और अब यह लोडर बेहतरीन तरीके से काम कर रहा है। आज भी जब प्रवीण अपने घर पर होते हैं, तो वे इस मशीन को और आधुनिक बनाने के लिए इसके पार्ट्स की ट्यूनिंग और मरम्मत में जुटे रहते हैं।

आर्थिक तंगी आ रही है बड़े सपनों के बीच

प्रवीण के भीतर कुछ बड़ा करने का जज्बा तो है, लेकिन उनके पास संसाधनों और पूंजी की भारी कमी है। उन्होंने अपनी जमा-पूंजी लगाकर यह तो साबित कर दिया कि वे एक बेहतरीन आविष्कारक हैं, लेकिन आगे की राह आसान नहीं है। वे चाहते हैं कि भविष्य में वे और भी कई ऐसी मशीनें बनाएं जो किसानों और छोटे व्यापारियों के काम आ सकें। प्रवीण को उम्मीद है कि अगर उन्हें सरकारी मदद या किसी संस्था से प्रोत्साहन मिले, तो वे अपनी इस प्रतिभा से समाज के लिए और भी उपयोगी उपकरण बना सकते हैं।

ग्रामीण प्रतिभा के लिए उम्मीद की नई किरण

सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में प्रवीण का यह आविष्कार एक बड़ी मिसाल है। यह दिखाता है कि ग्रामीण भारत के युवाओं में समस्याओं को हल करने की कितनी जबरदस्त क्षमता है। प्रवीण की यह कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि शासन-प्रशासन को ऐसी प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें तकनीकी मंच और आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ का सपना गांवों की छोटी वर्कशॉप से भी सच हो सके।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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