शिक्षा विभाग में गजब का खेल: बाबू ने खुद को बनाया ‘लेक्चरर’ और डकार गया 13 लाख, महीनों तक नहीं लगी भनक

छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में धोखाधड़ी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी प्रशासनिक मशीनरी को सोच में डाल दिया है। एक स्कूल में पदस्थ क्लर्क (बाबू) ने कागजों में हेरफेर कर रातों-रात अपना पद बदल लिया। उसने खुद को ‘लेक्चरर’ (व्याख्याता) घोषित किया और इसी ऊंचे पद के आधार पर महीनों तक मोटा वेतन उठाता रहा। हैरानी की बात यह है कि इस जालसाजी की खबर न तो स्कूल के प्राचार्य को हुई और न ही विभाग के बड़े अधिकारियों को। यह मामला अब उजागर होने के बाद विभाग की साख पर सवाल खड़े कर रहा है।

पद बदला और बढ़ा लिया वेतन: 13 लाख की चपत का खुलासा

यह पूरा मामला महासमुंद जिले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिरपुर का है। यहां सहायक ग्रेड-02 के पद पर पदस्थ नारायण प्रसाद निर्मलकर ने मई 2025 से दिसंबर 2025 के बीच सरकारी खजाने को करीब 13 लाख रुपये का चूना लगाया। जांच में पता चला है कि बाबू ने सिस्टम में अपना पदनाम बदलकर ‘व्याख्याता एलबी’ दर्ज कर दिया था। इसके बाद उसने लेवल-06 के बजाय लेवल-09 के अनुसार अपना वेतन तय कर लिया और हर महीने शासन के खाते से अवैध रूप से अतिरिक्त राशि निकालता रहा। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) का मानना है कि यदि पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, तो यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है।

खुद ही बनाता था सैलरी: डिजिटल सिग्नेचर का उठाया फायदा

धोखाधड़ी के इस खेल में सबसे बड़ी चूक मॉनिटरिंग के स्तर पर हुई। आरोपी बाबू ही स्कूल के सभी कर्मचारियों का वेतन तैयार करने का काम संभालता था। वह चालाकी से पूरी लिस्ट तैयार करता और प्राचार्य उमा ठाकुर से डिजिटल हस्ताक्षर करवा लेता था। प्राचार्य ने भी कभी वेतन बिलों की बारीकी से जांच नहीं की और आंख मूंदकर साइन कर दिए। इसके बाद कोषालय (ट्रेजरी) से बिना किसी रोक-टोक के भुगतान हो जाता था। खुद ही बिल बनाने और खुद ही अपना वेतन बढ़ाने की इस सुविधा ने उसकी इस जालसाजी को आठ महीनों तक छिपाए रखा।

ऐसे खुला राज: रायपुर से आई रिपोर्ट ने मचाया हड़कंप

इस घोटाले का पर्दाफाश जनवरी 2026 में हुआ, जब रायपुर स्थित संचालनालय कोष एवं लेखा के एक अधिकारी की नजर वेतन रिकॉर्ड की विसंगतियों पर पड़ी। जांच में पाया गया कि एक सहायक ग्रेड-02 कर्मचारी को व्याख्याता के बराबर भुगतान किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने तुरंत नोटिस जारी किया और 27 जनवरी को नारायण प्रसाद निर्मलकर को सेवा से निलंबित कर दिया। इस खुलासे के बाद से शिक्षा विभाग के अन्य स्कूलों के वेतन रिकॉर्ड की भी जांच की मांग उठने लगी है।

कार्रवाई पर सवाल: निलंबन तो हुआ, लेकिन अब तक FIR नहीं

गंभीर वित्तीय अनियमितता और जालसाजी का मामला होने के बावजूद, आरोपी बाबू के खिलाफ अब तक पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं कराई गई है। विभाग ने केवल निलंबन की कार्रवाई की है, जिससे प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक षड्यंत्र है, जिसमें सार्वजनिक धन की चोरी की गई है। लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि इतने बड़े घोटाले के बाद भी दोषी अब तक कानूनी कार्रवाई से बचा हुआ है।

सिस्टम में सुधार की जरूरत: ऑडिट और चेकिंग की खुली पोल

इस घटना ने सरकारी कार्यालयों में वेतन भुगतान की प्रक्रिया और आंतरिक ऑडिट की पोल खोलकर रख दी है। आर्म्स एक्ट या अन्य कड़े कानूनों की तरह ही वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में भी सख्त निगरानी की जरूरत महसूस की जा रही है। अगर एक बाबू अकेले दम पर पद बदलकर लाखों रुपये डकार सकता है, तो यह सिस्टम की बड़ी सुरक्षा चूक है। फिलहाल विभाग इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इस खेल में कार्यालय के कुछ अन्य लोग भी शामिल थे या यह सिर्फ एक व्यक्ति की ही कारस्तानी थी।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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