छत्तीसगढ़ में चावल का बड़ा ‘खेल’: अफसरों और मिलर्स की जुगलबंदी से खप रही कनकी, करोड़ों के घोटाले का खुलासा

छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के बाद अब कस्टम मिलिंग के नाम पर एक बड़ा घोटाला सामने आया है। प्रदेश में करोड़ों रुपये के धान घोटाले की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब राइस मिलर्स और विभागीय अफसरों की मिलीभगत से घटिया चावल खपाने का नया मामला उजागर हुआ है। इस खेल में अफसरों ने जालसाजी का ऐसा तरीका अपनाया कि खुद विभाग के बड़े अधिकारी भी दंग रह गए। मामला विधानसभा में उठने के बाद सरकार की काफी किरकिरी हुई है और अब तक कई दोषियों पर गाज गिर चुकी है।

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धान के बाद अब चावल में असली खेल: कनकी को बनाया कमाई का जरिया

प्रदेश में धान खरीदी के दौरान बाहरी राज्यों का धान खपाकर करोड़ों रुपये बनाए गए, लेकिन असली मुनाफा चावल की हेराफेरी में कमाया जा रहा है। राइस मिलर्स सरकार को दिए जाने वाले चावल में निर्धारित मात्रा से कहीं ज्यादा ‘ब्रोकन राइस’ यानी कनकी मिलाकर खपा रहे हैं। कोरबा जिले में उजागर हुए इस मामले ने साबित कर दिया है कि यह खेल धान घोटाले से भी ज्यादा बड़ा और मुनाफा देने वाला है।

मिलर्स की आपसी रंजिश से खुला राज: ऐसे मिला घोटाले का पहला सुराग

सरकारी नियम के मुताबिक, धान की कुटाई के दौरान टूटने वाले चावल (कनकी) की अधिकतम सीमा 25% तय है। इससे अधिक कनकी होने पर चावल अमानक माना जाता है। कोरबा जिले के ही कुछ राइस मिलर्स ने जब देखा कि एक खास समूह को अनुचित लाभ दिया जा रहा है, तो उन्होंने इसकी लिखित शिकायत मुख्यालय में कर दी। मिलर्स ने बाकायदा उन गोदामों और लॉट नंबरों की जानकारी दी, जहां घटिया चावल जमा किया गया था।

मास्टरमाइंड प्रमोद जांगड़े: अफसरों की मिलीभगत का बनाया चक्रव्यूह

जांच में सामने आया है कि इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड नागरिक आपूर्ति निगम (नान) के तत्कालीन प्रभारी प्रबंधक प्रमोद जांगड़े थे। जांगड़े ने क्वालिटी इंस्पेक्टरों (QI) के साथ मिलकर ऐसा जाल बुना कि किसी को शक तक नहीं हुआ। उन्होंने नियम विरुद्ध तरीके से घटिया चावल को पास कराने के लिए तकनीकी खामियों और विभागीय मिलीभगत का सहारा लिया।

डिजिटल हेराफेरी: दूसरे जिलों के इंस्पेक्टरों की आईडी का हुआ गलत इस्तेमाल

जब गोदाम में चावल की खेप ज्यादा होती है, तब दूसरे जिले के क्वालिटी इंस्पेक्टरों की मदद ली जाती है। जांगड़े ने योजनाबद्ध तरीके से बालोद, बेमेतरा और जशपुर के इंस्पेक्टरों की आईडी का उपयोग किया। मजेदार बात यह है कि ये इंस्पेक्टर कभी कोरबा आए ही नहीं, फिर भी उनकी आईडी से घटिया चावल को ‘बेहतरीन’ बताकर रिपोर्ट ऑनलाइन सबमिट कर दी गई।

मुख्यालय को भनक तक नहीं: बिना आदेश के हुआ आईडी ट्रांसफर का खेल

विभागीय नियमों के अनुसार, बिना मुख्यालय की अनुमति के किसी भी इंस्पेक्टर की आईडी दूसरे जिले में ट्रांसफर या मान्य नहीं की जा सकती। लेकिन जांगड़े ने प्रबंधकों से साठगांठ कर इस तकनीकी प्रक्रिया को बाईपास कर दिया। इस फर्जीवाड़े की जानकारी मिलने पर मुख्यालय के बड़े अफसर भी हैरान हैं कि बिना किसी लिखित आदेश के इतना बड़ा डिजिटल खेल कैसे हो गया।

करोड़ों का वारा-न्यारा: 8 हजार क्विंटल से ज्यादा घटिया चावल खपाया

इस घोटाले के जरिए कुल 8,153 क्विंटल अमानक चावल कोरबा के सरकारी गोदामों में डंप कर दिया गया। यह चावल आम जनता के खाने लायक बिल्कुल नहीं था। बाजार में इसकी कीमत करीब 3 करोड़ 34 लाख रुपये आंकी गई है। यह पैसा सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई का था, जिसे अफसरों और मिलर्स ने अपनी जेबों में भर लिया।

अब तक चार पर गिरी गाज: विधानसभा में गूंजा भ्रष्टाचार का मामला

मामला जब विधानसभा के बजट सत्र में उठा और विधायक व्यास कश्यप ने सवाल दागे, तब सरकार हरकत में आई। जवाब पेश होने से पहले ही मुख्य आरोपी प्रमोद जांगड़े को निलंबित कर दिया गया। इसके अलावा, बेमेतरा के क्वालिटी इंस्पेक्टर महेश्वर लाल सोनवानी और कोरबा के प्रकाश बरेठ समेत चार अधिकारियों को सस्पेंड किया जा चुका है।

15 राइस मिलर्स को नोटिस: चावल बदलने का आदेश, ब्लैकलिस्ट से बचाव

जांच में 26 लॉट चावल अमानक पाए गए, जो 15 अलग-अलग राइस मिलों से आए थे। इनमें कोरबा समेत रायपुर और सक्ती के बड़े मिलर्स शामिल हैं। प्रशासन ने इन्हें नोटिस जारी कर अमानक चावल के बदले अच्छी गुणवत्ता का चावल देने को कहा है। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी के बाद भी इन मिलर्स को अब तक ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया है।

केवल ‘नमूना’ है कोरबा: पूरे प्रदेश में फैला है भ्रष्टाचार का जाल

जानकारों का मानना है कि कोरबा में जो हुआ वह तो महज एक बानगी भर है। पूरे छत्तीसगढ़ में कस्टम मिलिंग के नाम पर इसी तरह का खेल चल रहा है। कोरबा के कई राशन दुकानों में आज भी वही घटिया चावल बांटा जा रहा है, जिसे जांच में अमानक पाया गया था। खाद्य विभाग सब कुछ जानकर भी अनजान बना हुआ है, जिससे गरीबों के निवाले पर संकट बना हुआ है।

चावल में कनकी नहीं, कनकी में चावल: राशन दुकानों की कड़वी सच्चाई

घोटाले की हकीकत देखनी हो तो किसी भी सरकारी राशन दुकान पर जाकर बोरों की स्थिति देखी जा सकती है। वहां चावल में कनकी नहीं, बल्कि कनकी के ढेर में थोड़े-बहुत चावल के दाने नजर आते हैं। राशन लेने आए लोग बताते हैं कि यह चावल पकाने पर अक्सर गीला और लसदार हो जाता है, जिसे खाना मुश्किल होता है।

‘मेरी-गो-राउंड’ का खेल: राशन दुकान से वापस मिल तक पहुंचता है चावल

घटिया क्वालिटी के कारण ज्यादातर गरीब लोग इस चावल को नहीं खाते। वे इसे वापस उसी राशन दुकानदार को सस्ते दाम पर बेच देते हैं। बाद में यही अमानक चावल घूम-फिरकर वापस राइस मिलों में पहुंचता है और वहां से फिर सरकारी गोदामों में। यह एक चक्र की तरह चलता रहता है जिसे ‘मेरी-गो-राउंड’ कहा जा रहा है, जहां सरकार का पैसा बर्बाद हो रहा है और जनता को पोषण नहीं मिल रहा।

वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन: कागजों में सब ठीक, हकीकत में भ्रष्टाचार

इस घोटाले ने साबित कर दिया है कि कागजों पर सब कुछ सही दिखाने के लिए किस तरह से तकनीकी प्रक्रियाओं से छेड़छाड़ की जा रही है। विभागीय ऑडिट और मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह से फेल नजर आ रहा है। जब तक निचले स्तर के अधिकारियों और मिलर्स के इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक सरकारी खजाने की ऐसी ही लूट मची रहेगी।

खाद्य विभाग की चुप्पी: दोषियों को बचाने की कोशिश के आरोप

इतने बड़े पैमाने पर अमानक चावल की आपूर्ति होने के बावजूद खाद्य विभाग की ढिलाई कई सवाल खड़े करती है। नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे मिलर्स पर फौजदारी मामला दर्ज होना चाहिए। आरोप लग रहे हैं कि विभाग के कुछ ऊंचे पदस्थ अधिकारी अभी भी दोषियों को बचाने और मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं।

जनता का हक और सरकारी जिम्मेदारी

अंततः इस भ्रष्टाचार का खामियाजा उन आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है जो सरकारी राशन पर निर्भर हैं। सरकार को चाहिए कि वह न केवल दोषियों को सजा दे, बल्कि पूरे प्रदेश के गोदामों का रैंडम फिजिकल वेरिफिकेशन कराए। डिजिटल आईडी के दुरुपयोग को रोकने के लिए ‘टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’ जैसे सख्त सुरक्षा उपाय लागू करना अब समय की मांग बन गया है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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