
छत्तीसगढ़ में बिना बुनियादी सुविधाओं और अपने भवन के चल रहे निजी स्कूलों पर अब गाज गिरना तय माना जा रहा है। बिलासपुर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। विभाग ने प्रदेश के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को आपातकालीन निर्देश जारी करते हुए महज दो दिनों के भीतर ऐसे स्कूलों की विस्तृत जानकारी मांगी है। कोर्ट की इस सख्ती ने उन स्कूल संचालकों की नींद उड़ा दी है जो कागजों पर तो मान्यता ले चुके हैं, लेकिन जमीन पर उनके पास न तो पर्याप्त कमरे हैं और न ही जरूरी ढांचा।
नियमों की धज्जियां: दुकानों और किराए के कमरों में चल रही ‘शिक्षा की दुकान’
प्रदेश में निजी स्कूल खोलने के लिए अपना भवन, खेल का मैदान और पर्याप्त कमरों का होना अनिवार्य शर्त है। हालांकि, हकीकत इसके ठीक उलट है। शहरों की तंग गलियों से लेकर गांवों तक ऐसे दर्जनों स्कूल संचालित हो रहे हैं जो किराए की दुकानों, छोटे कमरों या अस्थायी ढांचों में चल रहे हैं। कई स्कूलों में तो पीने के पानी और शौचालयों तक की उचित व्यवस्था नहीं है। यह स्थिति न केवल शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन है, बल्कि वहां पढ़ने वाले मासूम बच्चों की सुरक्षा और भविष्य के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है।
राजधानी का हाल: अफसरों की नाक के नीचे चल रहे मापदंड विहीन स्कूल
हैरानी की बात यह है कि रायपुर जैसे बड़े शहर में शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों के दफ्तरों के पास ही ऐसे कई स्कूल फल-फूल रहे हैं। विभाग के कुछ अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने गलत रिपोर्ट पेश करके इन स्कूलों को मान्यता दे दी। पूर्व में कुछ स्कूलों पर कार्रवाई की बात तो हुई, लेकिन हकीकत में वे आज भी बिना किसी रोक-टोक के चल रहे हैं। अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद विभाग उन फाइलों को दोबारा खोलने पर मजबूर हुआ है जिन्हें लंबे समय से दबाकर रखा गया था।
कोर्ट की फटकार: 2 अप्रैल तक हर हाल में देनी होगी भवन विहीन स्कूलों की जानकारी
हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को कड़ी फटकार झेलनी पड़ी। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे 2 अप्रैल 2026 तक अपने क्षेत्र के ऐसे सभी स्कूलों की सूची सौंपें जिनके पास अपना भवन नहीं है। रिपोर्ट में स्कूलों की मान्यता की तारीख, छात्रों की कुल संख्या और वहां संचालित होने वाली कक्षाओं का पूरा ब्यौरा मांगा गया है। समय सीमा के भीतर जानकारी न देने वाले अधिकारियों पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
जांच के घेरे में अफसर: गलत रिपोर्टिंग करने वालों की भी तय होगी जवाबदेही
इस पूरे मामले में केवल स्कूल संचालक ही नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के वे अधिकारी भी जांच के दायरे में हैं जिन्होंने इन स्कूलों का निरीक्षण किया था। मांग उठ रही है कि उन जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई हो जिनकी मिलीभगत से बिना खेल मैदान और बिना कमरों वाले स्कूलों को हरी झंडी मिली। अगर जांच निष्पक्ष होती है, तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ के लिए इन स्कूलों को मान्यता दिलाने में मदद की।
विवादों में नामी संस्थान: लीज और किराए के परिसरों पर उठा सवाल
न्यायधानी बिलासपुर का प्रसिद्ध नारायणा टेक्नोक्रेट स्कूल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जानकारी के अनुसार, यह स्कूल अपने स्वयं के भवन के बजाय लीज पर लिए गए परिसर में चल रहा है, जिसके लिए भारी-भरकम सालाना किराया दिया जा रहा है। ऐसे बड़े संस्थानों का लीज पर चलना नियमों की पेचीदगियों को उजागर करता है। इसी तरह के कई अन्य रसूखदार स्कूलों की फाइलें भी अब दोबारा खंगाली जा रही हैं ताकि यह देखा जा सके कि क्या वे वाकई सरकारी मापदंडों पर खरे उतरते हैं।
छात्रों का विरोध: ‘लापता डीईओ’ के पोस्टरों से विभाग की कार्यशैली पर प्रहार
शिक्षा विभाग की सुस्त कार्यशैली को लेकर छात्र संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है। बिलासपुर में एनएसयूआई (NSUI) के कार्यकर्ताओं ने जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के बाहर “लापता डीईओ” के पोस्टर लगाकर अपना विरोध जताया। छात्रों का आरोप है कि अधिकारी कार्यालयों से नदारद रहते हैं और निजी स्कूलों की मनमानी पर कोई लगाम नहीं लगाई जा रही है। हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब यह देखना होगा कि विभाग केवल जानकारी जुटाने तक सीमित रहता है या वाकई में इन स्कूलों की मान्यता रद्द करने जैसा कोई कड़ा कदम उठाता है।



