Bastar News: बस्तर में नक्सलियों के मर्जी के बिना अब ढोल-नगाड़ों के साथ आ रही बारात; 20 साल बाद लौटा खुशियों का दौर

बस्तर के जगरगुंडा इलाके से माओवाद की दहशत कम होने के साथ ही अब वहां की सामाजिक तस्वीर बदलने लगी है। एक समय था जब इस क्षेत्र में बाहरी लोग अपनी बेटी का रिश्ता तय करने से भी कतराते थे। नक्सलियों के डर से यहां सालों तक किसी की बारात नहीं आई थी। लेकिन अब जब सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हुई है और सड़कों का जाल बिछा है, तो टूटे हुए रिश्ते फिर से जुड़ने लगे हैं। ग्रामीण अब बिना किसी डर के अपने मांगलिक कार्यों का आयोजन कर रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि बस्तर धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है।

जब शादियों के लिए लेनी पड़ती थी नक्सलियों की मंजूरी

वो दौर बेहद भयावह था जब जगरगुंडा क्षेत्र में शादी करने के लिए नक्सलियों से इजाजत मांगनी पड़ती थी। ग्रामीणों को बाकायदा संगठन को यह बताना होता था कि वे किस इलाके में रिश्ता जोड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, बारात में कितने लोग शामिल होंगे, कार्यक्रम कितने बजे शुरू होगा और बाराती वापस कब लौटेंगे, यह सब नक्सलियों की शर्तों पर तय होता था। ऐसी शादियों में सरकारी नौकरी करने वाले रिश्तेदारों को बुलाने की मनाही थी, क्योंकि उनकी जान को हमेशा खतरा बना रहता था।

दुख की घड़ी में भी अकेले पड़ जाते थे ग्रामीण

नक्सली आतंक का असर सिर्फ शादी-ब्याह जैसे उत्सवों तक सीमित नहीं था। अगर परिवार में कोई बीमार पड़ता या किसी की मृत्यु हो जाती, तब भी रिश्तेदार इस इलाके में आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। आदिवासी और हल्बा समाज के लोग न तो पंडितों से मुहूर्त निकलवा सकते थे और न ही रीति-रिवाजों का पालन कर पाते थे। डर के साये में जीने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने इस क्षेत्र से पलायन कर लिया था। अब शांति बहाल होने के बाद लोग न केवल वापस लौट रहे हैं, बल्कि हर संस्कार को विधि-विधान से पूरा कर रहे हैं।

कामाराम गांव में दो दशक बाद गूंजी शहनाई

जगरगुंडा से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित कामाराम गांव में हाल ही में खुशियों का एक नया मंजर देखने को मिला। दंतेवाड़ा के गोंगपाल गांव से एक बारात गाजे-बाजे और गाड़ियों के साथ यहां पहुंची। साल 2005 के बाद यह पहला मौका था जब किसी दूल्हे की बारात इतने भव्य तरीके से गांव की सीमा में दाखिल हुई। सजी-धजी गाड़ियों और बारातियों का उत्साह देखकर पूरे गांव की भीड़ जमा हो गई। लोग हैरान थे कि जिस रास्ते पर कभी चलना मुश्किल था, वहां आज खुशियों की गाड़ी दौड़ रही है।

अपनों से जुड़ने लगे हैं अब सामाजिक रिश्ते

गोंगपाल से आए वर पक्ष के सदस्य प्रेम नाग ने बताया कि जगरगुंडा क्षेत्र में उनके कई नाते-रिश्तेदार रहते हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से सालों तक उनके बीच आना-जाना पूरी तरह बंद था। अब स्थितियां बदली हैं, तो उन्होंने पुरानी दूरियों को मिटाकर दोबारा रिश्तेदारी शुरू की है। यह केवल एक शादी नहीं है, बल्कि दो परिवारों और दो क्षेत्रों के बीच विश्वास की बहाली है। सड़कों के बनने और पुलिस कैंपों के खुलने से अब लोग रात के समय भी सफर करने में डर महसूस नहीं कर रहे हैं।

बस्तर की बदलती तस्वीर और नया सवेरा

जगरगुंडा और आसपास के इलाकों में बारातों का आना इस बात का सबूत है कि माओवाद की जड़ें अब कमजोर पड़ चुकी हैं। शासन की विकास योजनाओं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों ने ग्रामीणों के मन से डर को बाहर निकाल दिया है। अब यहां के युवा अपनी पसंद और मर्जी से जीवनसाथी चुन रहे हैं और बिना किसी पाबंदी के शादी का जश्न मना रहे हैं। बस्तर की फिजाओं में अब गोलियों की गूंज की जगह शहनाइयों और लोकगीतों की आवाज सुनाई देने लगी है, जो एक नए और शांत बस्तर की पहचान है।

Also Read: Hidma Song Video: खूंखार नक्सली हिड़मा के समर्थन में भड़काऊ गाना: रायपुर पुलिस ने दर्ज की UAPA के तहत FIR, यूट्यूबर की तलाश शुरू

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button