CG RTE Private School Admission: छत्तीसगढ़ के प्राइवेट स्कूलों में RTE एडमिशन कल से शुरू: एसोसिएशन ने वापस लिया फैसला, पर जारी रहेगा आंदोलन

CG RTE Private School Admissio: छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के दाखिले को लेकर चल रहा गतिरोध आखिरकार खत्म हो गया है। छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने सोमवार 18 मई 2026 से आरटीई के तहत बच्चों को प्रवेश देने का एक बड़ा और संवेदनशील निर्णय लिया है। एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने साफ किया है कि गरीब बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है ताकि किसी भी होनहार छात्र की पढ़ाई बाधित न हो। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर निजी स्कूलों का असहयोग आंदोलन आगे भी लगातार जारी रहेगा।

1 मार्च से चल रहा था असहयोग आंदोलन, खाली रह गईं आधे से ज्यादा सीटें

उल्लेखनीय है कि अपनी विभिन्न मांगों की अनदेखी से नाराज होकर प्रदेश के निजी स्कूलों ने बीते 1 मार्च से सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका था। इसके तहत स्कूलों ने इस साल आरटीई के तहत मिलने वाली सीटों पर गरीब बच्चों को दाखिला न देने का कड़ा फैसला किया था। एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता के अनुसार, स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा हाल ही में जारी किए गए आरटीई प्रवेश के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य के 33 में से 29 जिलों में 50 फीसदी से अधिक सीटें खाली पड़ी हैं। उन्होंने इस आंकड़े को निजी स्कूलों के आंदोलन की रणनीतिक सफलता बताया है।

फीस प्रतिपूर्ति राशि न बढ़ने पर हाईकोर्ट की शरण, शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस

निजी स्कूलों और सरकार के बीच विवाद की मुख्य वजह आरटीई के तहत पढ़ाए जाने वाले बच्चों की फीस प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) राशि में बढ़ोतरी न होना है। संगठन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने 19 सितंबर 2025 को शिक्षा विभाग को निर्देश दिया था कि वह 6 महीने के भीतर एसोसिएशन के प्रतिवेदन पर उचित निर्णय ले। इस न्यायिक आदेश का समय पर पालन न होने के कारण संगठन ने कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी। इस मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्कूल शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेसी को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है।

ढाई महीने के आंदोलन के बाद भी नहीं बनी बात, विभाग पर दमन करने का आरोप

एसोसिएशन का कहना है कि पिछले ढाई महीने से लगातार शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करने के बावजूद शासन स्तर पर उनकी जायज मांगों को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। प्राइवेट स्कूल संचालकों ने आरोप लगाया कि उनकी एकजुटता और आंदोलन की सफलता से घबराकर स्कूल शिक्षा विभाग ने विभिन्न प्रशासनिक तरीकों और दबावों के जरिए इस मुहिम को कुचलने का प्रयास किया है। प्रबंधन का दावा है कि वे दवाब में आने वाले नहीं हैं और जब तक उनकी दोनों मुख्य मांगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक उनका प्रशासनिक असहयोग बरकरार रहेगा।

एंट्री क्लास बदलने से नाराज हैं स्कूल, 65 हजार से घटकर 22 हजार रह गईं सीटें

निजी स्कूलों का असहयोग आंदोलन अब केवल फीस प्रतिपूर्ति राशि बढ़ाने तक सीमित नहीं रह गया है। इस साल स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा आरटीई के तहत प्रवेश की शुरुआती श्रेणी (एंट्री क्लास) को बदलकर सीधे कक्षा पहली कर दिया गया है, जिसका पुरजोर विरोध हो रहा है। संगठन की मांग है कि इस नियम को वापस लिया जाए और पूर्व की तरह नर्सरी या केजी क्लास को ही एंट्री क्लास माना जाए। इस नए बदलाव के कारण हर साल प्रवेश पाने वाले करीब 65,000 बच्चों की तुलना में इस वर्ष रिक्त सीटों का ग्राफ घटकर महज 22,000 पर सिमट गया है, जिससे हजारों गरीब बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे हैं।

सरकारी स्कूलों के खर्च का डेटा सार्वजनिक करने की मांग, पारदर्शी नियम बनाने की अपील

छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने एक बार फिर स्कूल शिक्षा विभाग से पुरजोर मांग की है कि शासकीय स्कूलों में प्रति विद्यार्थी होने वाले वास्तविक सरकारी खर्च के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए। एसोसिएशन के पदाधिकारियों का तर्क है कि शिक्षा के अधिकार कानून के नियमों में साफ तौर पर यह उल्लेख किया गया है कि सरकारी स्कूलों में एक बच्चे पर जितना पैसा खर्च होता है, उतनी ही राशि निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जानी चाहिए। पारदर्शी आंकड़े सामने आने के बाद ही निजी और सरकारी तंत्र के बीच चल रहा यह वित्तीय विवाद हमेशा के लिए सुलझ सकेगा।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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