
CG High Court Bureaucracy FIR Warning: छत्तीसगढ़ में सरकारी अधिकारियों की लापरवाही और अदालती आदेशों को ठंडे बस्ते में डालने की प्रवृत्ति पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। राज्य में न्यायपालिका से अपने हक में फैसला आने के बाद भी आम जनता को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्रशासनिक सुस्ती के कारण पीड़ितों को अपने आदेशों का पालन करवाने के लिए दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। इस कतार में केवल निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ आईएएस, आईपीएस अधिकारी, विश्वविद्यालयों के कुलपति और सरकारी उपक्रमों के सीएमडी तक शामिल हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना को अब बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषी अफसरों पर सीधी कार्रवाई होगी।
आठ सालों में छह गुना बढ़े कोर्ट की अवमानना के मामले, सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था की खुली पोल
हाईकोर्ट में हर साल दर्ज होने वाले अवमानना के आंकड़े सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली को उजागर करते हैं। दिसंबर 2015 में जहां अदालत के पास अवमानना के केवल 391 मामले लंबित थे, वहीं दिसंबर 2022 तक यह संख्या बढ़कर 2324 तक पहुंच गई। इसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और अप्रैल 2026 की स्थिति के अनुसार वर्तमान में 1945 अवमानना याचिकाएं अभी भी पेंडिंग हैं। सिर्फ आठ साल के भीतर मामलों का छह गुना बढ़ जाना यह साफ दिखाता है कि प्रशासनिक अमले में जवाबदेही की भारी कमी है, जो पूरी न्याय प्रणाली के समय को बर्बाद कर रही है।
हक की लड़ाई के लिए दोबारा जेब ढीली करने को मजबूर आम जनता, न्याय व्यवस्था पर उठता भरोसा
अदालत से मुकदमा जीतने के बाद भी आम नागरिकों का संघर्ष खत्म नहीं होता। कई विभागों के जिम्मेदार अधिकारी अदालती आदेशों को फाइलों में दबाकर बैठ जाते हैं। जब तय समय सीमा बीतने के बाद भी प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं होती, तो परेशान पीड़ित भारी-भरकम फीस चुकाकर वकीलों के माध्यम से दोबारा कोर्ट पहुंचते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल न्याय व्यवस्था को कमजोर बनाती है, बल्कि इससे न्याय पाने की आस में बैठे गरीब और लाचार लोगों का कानून पर से भरोसा भी उठने लगता है।
अवमानना करने वाले अफसरों पर सीधे एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी, कड़े रुख में दिखी अदालत
हाल के दिनों में हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान अधिकारियों के रवैये पर तीव्र नाराजगी जाहीर की है। शिक्षकों की भर्ती पर रोक के बावजूद जॉइनिंग देने, जल संसाधन विभाग में नियमों के विरुद्ध पोस्टिंग करने और सड़कों पर आवारा मवेशियों के कारण होने वाले हादसों को रोकने के आदेश पर अमल न करने जैसे कई मामलों में कोर्ट ने कड़े तेवर दिखाए हैं। राजस्व रिकॉर्ड गायब होने से जुड़े एक गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान तो अदालत ने दोषी अफसरों के खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज कराकर दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी भी दे दी है।
जानिए क्या कहता है कानून, अवमानना एक्ट के तहत हो सकती है 6 महीने की जेल और जुर्माना
अदालत के वैधानिक आदेशों की जानबूझकर उपेक्षा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971 के तहत कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज करना सिविल अवमानना की श्रेणी में आता है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले लोक सेवकों को अधिकतम छह महीने की जेल, दो हजार रुपए का जुर्माना या फिर जेल और जुर्माना दोनों एक साथ भुगतने की सजा दी जा सकती है। हालांकि, यदि संबंधित अधिकारी बिना किसी शर्त के अदालत के सामने अपनी गलती मानकर लिखित माफी मांग लेता है, तो कोर्ट उसे राहत भी दे सकता है।
विशेषज्ञों का सुझाव: दोषी अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज हो अवमानना, जेब से वसूला जाए खर्च
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रजनीश सिंह बघेल और अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि अब इस प्रशासनिक ढिलाई पर रोक लगाने के लिए केवल फटकार लगाना काफी नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया है कि आदेश टालने वाले अफसरों को सीधे जेल भेजने जैसी सख्त नजीर पेश करनी होगी। इसके अलावा, अवमानना के मामलों को सीधे संबंधित अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए और पीड़ित पक्ष का कोर्ट-कचहरी में होने वाला पूरा कानूनी खर्च दोषी अधिकारी के निजी वेतन से वसूला जाना चाहिए ताकि अधिकारियों में कानून का डर बना रहे।



