
Bilaspur Snakebite Scam: छत्तीसगढ़ की न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर जिले में सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां आपदा राहत के तहत मिलने वाली सर्पदंश मुआवजा योजना में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया है। कुछ शातिर वकीलों और डॉक्टरों ने आपस में सांठगांठ कर जहर खाने से हुई आत्महत्या और सामान्य मौतों को भी सांप के काटने से हुई मौत में बदल दिया। इस फर्जी खेल के जरिए सरकारी खजाने से करीब 60 लाख रुपये की राशि अवैध रूप से निकाल ली गई। जांच में खुलासा होने के बाद अब प्रशासनिक अमला दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसने की तैयारी में है।
ऐसे तैयार होता था फर्जीवाड़े का पूरा दस्तावेज
इस संगठित घोटाले को अंजाम देने के लिए दलालों का एक पूरा नेटवर्क सक्रिय रूप से काम कर रहा था। इस नेटवर्क ने सरकारी डॉक्टरों, स्थानीय पुलिस के जांच अधिकारियों और वकीलों को अपने साथ मिला रखा था। जब भी किसी व्यक्ति की सामान्य मौत या जहर खाने से मौत होती, तो यह रैकेट सक्रिय हो जाता था। इसके बाद अस्पताल के जाली दस्तावेज, फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और थाने के झूठे कागजात तैयार किए जाते थे। इन जाली कागजातों को असली बताकर जिला प्रशासन के सामने मुआवजे की फाइल पेश की जाती थी और सरकारी राहत राशि हड़प ली जाती थी।
विधानसभा में गूंजा मामला तो खुलीं परतें
इस पूरे महाघोटाले का पर्दाफाश तब हुआ जब बेलतरा क्षेत्र के विधायक सुशांत शुक्ला ने इस गंभीर विषय को विधानसभा में प्रमुखता से उठाया। मामला सदन में गूंजने के बाद शासन स्तर पर इसकी उच्च स्तरीय सचिवीय जांच के आदेश दिए गए। जब वरिष्ठ अधिकारियों की टीम ने फाइलों की स्क्रूटनी शुरू की, तो भ्रष्टाचार की परतें एक-एक कर उखड़ने लगीं। इस मामले में शहर के बिल्हा और सरकंडा थानों में पहले ही कुछ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं, लेकिन अब जांच का दायरा बढ़ने के बाद अन्य थानों में भी शिकायतें भेजी जा रही हैं।
जशपुर और बिलासपुर के आंकड़ों ने खोली पोल
इस घोटाले की सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाली बात इसके आंकड़े हैं। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले को ‘नागलोक’ कहा जाता है, जहां सांपों की संख्या सबसे ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जशपुर में सर्पदंश से केवल 96 मौतें दर्ज हुईं और वहां 3 करोड़ रुपये का मुआवजा बंटा। इसके विपरीत, अकेले बिलासपुर जिले में 431 मौतें दिखाकर 17 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बांट दी गई। मौतों की संख्या में आए इसी अस्वाभाविक और भारी अंतर ने पूरी व्यवस्था पर शक पैदा किया, जिसके बाद पूर्व नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने भी केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट की गहन जांच के बाद ही भुगतान करने की मांग उठाई थी।
सिम्स और जिला अस्पताल तक जुड़े हैं रैकेट के तार
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े का नेटवर्क शहर के प्रतिष्ठित सिम्स (CIMS) अस्पताल और जिला चिकित्सालय के भीतर तक फैला हुआ है। जांच दल को अंदेशा है कि अस्पताल के कुछ कर्मचारियों और डॉक्टरों की मदद के बिना इतनी बड़ी संख्या में फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करना मुमकिन नहीं था। अब तक की जांच में कुल 17 मामलों में पूरी तरह से फर्जीवाड़ा प्रमाणित हो चुका है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम मनीष साहू ने स्पष्ट किया है कि सरकारी धन की हेराफेरी करने वाले किसी भी रसूखदार को बख्शा नहीं जाएगा और जल्द ही संलिप्त डॉक्टरों और वकीलों पर नामजद एफआईआर दर्ज होगी।
जांच में फर्जी पाए गए इन 17 लोगों के मामले
बिलासपुर प्रशासन द्वारा की गई शुरुआती जांच में जिन 17 मृतकों के नाम पर फर्जी तरीके से सर्पदंश का मामला बनाया गया था, उनकी सूची सार्वजनिक कर दी गई है। इनमें तालापारा की शिवकुमारी यादव और कुंती बाई प्रजापति, तखतपुर की सुनीता बाई सोनवानी और उर्वशी श्रीवास, महमंद के संतोष कुमार और सफीना बानो, कोनी के भगत सिंह ठाकुर और रामनारायण कैवर्त शामिल हैं। इसके अलावा खमतराई के बहोरन लाल जायसवाल व अशोक कुमार, सरकंडा के शंकर साहू, शशि पाठक व राजू कुमार सहित केशव कुमार कश्यप, निर्मला धृतलहरे, मनसुख लाल साहू और बोदरी की लक्ष्मीन कुर्रे की मौत से जुड़े मामलों में भी फर्जीवाड़ा पूरी तरह साबित हो चुका है।



