
CG Daily Wager Regularization High Court Oder: छत्तीसगढ़ के हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट से एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है. अदालत ने कोरबा नगर निगम में कार्यरत 60 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस पुराने आदेश को सिरे से रद्द कर दिया है, जिसके जरिए इन कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया गया था. जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य शासन और कोरबा नगर निगम प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे 180 दिनों के भीतर सभी प्रभावित कर्मचारियों के मामलों की नए सिरे से समीक्षा करें और उचित निर्णय लें.
साल 1997 से 2000 के बीच हुई थी नियुक्तियां, दो दशक से ज्यादा समय से नियमित होने का इंतजार
यह पूरा मामला कोरबा नगर निगम के कर्मचारियों से जुड़ा हुआ है. पीड़ित कर्मचारी मनीष मिश्रा और उनके 60 अन्य साथियों ने वकीलों के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने हक की गुहार लगाई थी. याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्तियां साल 1997 से लेकर 2000 के बीच अलग-अलग विभागों में दैनिक वेतनभोगी के रूप में की गई थीं. तब से लेकर अब तक वे लगभग 24 साल की लंबी सेवा पूरी कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन ने उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया, जिससे उनके सामने आर्थिक और मानसिक परेशानियां खड़ी हो रही थीं.
तकनीकी खामियों का हवाला देकर शासन ने खारिज किया था दावा, ब्रेक इन सर्विस को बनाया था बहाला
दरअसल, राज्य सरकार ने साल 2008 में एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें प्रावधान था कि 10 साल की निरंतर सेवा पूरी करने वाले दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित किया जाएगा. इस नियम के बावजूद कोरबा नगर निगम के इन कर्मचारियों का दावा खारिज कर दिया गया. सरकार की तरफ से दलील दी गई थी कि अधिकांश कर्मचारियों की नियुक्ति 31 दिसंबर 1997 के बाद की है और उनके सेवा रिकॉर्ड में कुछ दिनों का अंतराल यानी ‘ब्रेक इन सर्विस’ दर्ज है. इसी तकनीकी बिंदु को आधार बनाकर प्रशासन ने इतने सालों से काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करने से साफ मना कर दिया था.
हाईकोर्ट ने सरकारी दलीलों को ठहराया अपर्याप्त, कहा कि कृत्रिम अंतराल के आधार पर हक नहीं छीन सकते
दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तर्कों को अपर्याप्त और अनुचित माना. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी दशकों से किसी सरकारी संस्थान को अपनी सेवाएं दे रहा है, तो केवल सेवा में आए किसी छोटे या कृत्रिम अंतराल को आधार बनाकर उसे उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. जस्टिस पांडेय की पीठ ने 12 मई 2020 को जारी सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत इन दैनिक वेतनभोगियों की नियमितीकरण की अर्जियां खारिज की गई थीं.
समानता के संवैधानिक नियमों का उल्लंघन, जब दूसरों को मिला लाभ तो इनसे भेदभाव क्यों
अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी कड़ा रुख अपनाया कि प्रशासन अलग-अलग कर्मचारियों के लिए अलग-अलग पैमाना नहीं अपना सकता. कोर्ट ने कहा कि जब समान परिस्थितियों और समान कार्य अवधि वाले दूसरे कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ दिया जा चुका है, तो इन 60 याचिकाकर्ताओं के साथ दोहरा मापदंड अपनाना पूरी तरह गलत है. हाईकोर्ट ने इसे भारतीय संविधान के समानता के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए कहा कि कोई भी लोक कल्याणकारी सरकार अपने ही कर्मचारियों के साथ इस तरह का भेदभावपूर्ण रवैया नहीं रख सकती.
सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है कोई निजी कंपनी नहीं, 6 महीने के भीतर पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए सरकार को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाई. अदालत ने कहा कि सरकार कोई निजी संस्था नहीं है, बल्कि एक ‘संवैधानिक नियोक्ता’ है. इसलिए सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह पूरी पारदर्शिता और न्याय के साथ काम करे. लंबे समय तक स्थायी प्रकृति के काम के लिए कर्मचारियों को अस्थायी रखना एक तरह का शोषण है. अब हाईकोर्ट ने शासन को आदेश की कॉपी मिलने के 180 दिनों के भीतर सभी 60 मामलों का दोबारा परीक्षण करने को कहा है, जिसमें तकनीकी कमियों को छोड़कर उनकी वास्तविक सेवा को प्राथमिकता देनी होगी.



