
Teejan Bai Unknown Facts: छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव की मिट्टी से उठी एक आवाज ने पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया था। हाथ में तंबूरा, चेहरे पर अद्भुत भाव और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली शैली। यह कोई साधारण लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि पंडवानी की वह सम्राज्ञी थीं, जिनका नाम आज भारतीय लोककला के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
Teejan Bai Story: पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनके जीवन का सफर किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। उन्होंने सिर्फ एक लोककला को बचाया नहीं, बल्कि उसे दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाया। उनकी कला के प्रशंसकों में प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति और दुनिया के कई बड़े सांस्कृतिक संस्थान शामिल रहे।
आइए जानते हैं उनके जीवन के 10 ऐसे किस्से, जो बताते हैं कि आखिर क्यों तीजन बाई सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक संस्था थीं।
1. नाना की चौपाल से शुरू हुई पंडवानी की यात्रा
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके नाना ब्रजलाल पारधी महाभारत की कथाएं गाया करते थे। गांव में जब शाम ढलती, लोग चौपाल पर जुटते और महाभारत के प्रसंग सुनते।
छोटी तीजन भी चुपचाप बैठकर इन कथाओं को सुनती रहती थीं। उन्हें इतनी रुचि थी कि धीरे-धीरे उन्होंने कई प्रसंग याद कर लिए। किसी ने नहीं सोचा था कि यही बच्ची एक दिन महाभारत की इन कथाओं को दुनिया के मंचों पर पहुंचाएगी।
2. 13 साल की उम्र में पहली प्रस्तुति और लोगों का हैरान रह जाना
कहा जाता है कि जब उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी प्रस्तुत की, तब उनकी उम्र महज 13 वर्ष थी। गांव के लोग एक छोटी लड़की को महाभारत सुनाते देख पहले हैरान हुए और फिर उसकी आवाज के जादू में खो गए।
उस दिन के बाद गांव में एक ही चर्चा थी, “यह लड़की आगे जाकर बहुत बड़ा नाम करेगी।”
3. जब समाज ने कहा, ‘यह काम महिलाओं का नहीं’
उस दौर में पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां थीं। वेदमती शैली में महिलाएं बैठकर गायन करती थीं, जबकि कापालिक शैली में खड़े होकर अभिनय के साथ प्रस्तुति देना पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था।
लेकिन तीजन बाई ने परंपरा को चुनौती दे दी।
उन्होंने तंबूरा हाथ में लेकर खड़े होकर पंडवानी गाना शुरू किया। कभी वह तंबूरा भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का धनुष और कभी द्रौपदी के खुले केश।
यह प्रयोग लोगों को पसंद तो आया, लेकिन समाज के कुछ वर्गों ने इसका विरोध भी किया।
4. समाज ने बहिष्कार किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी
तीजन बाई ने कई बार अपने साक्षात्कारों में बताया कि शुरुआत में उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। लोगों ने कहा कि एक महिला का इस तरह मंच पर अभिनय करना परंपरा के खिलाफ है।
लेकिन उन्होंने अपने सपनों से समझौता नहीं किया।
कई बार आर्थिक तंगी भी आई, लेकिन उन्होंने पंडवानी का दामन नहीं छोड़ा। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
5. जब हबीब तनवीर ने पहचानी उनकी प्रतिभा
प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने जब पहली बार उनकी प्रस्तुति देखी तो वे उनकी कला से बेहद प्रभावित हुए।
उन्होंने महसूस किया कि यह कलाकार सिर्फ छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे देश की धरोहर है।
हबीब तनवीर की सराहना और सहयोग के बाद तीजन बाई को बड़े मंच मिलने लगे और उनकी पहचान तेजी से बढ़ी।
6. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी हो गई थीं उनकी कला की प्रशंसक
साल 1980 के दशक में उनकी ख्याति दिल्ली तक पहुंच चुकी थी। उन्हें राष्ट्रीय कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाने लगा।
एक प्रस्तुति के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी पंडवानी सुनी और उनकी कला की प्रशंसा की।
छत्तीसगढ़ की एक लोकगायिका के लिए यह बहुत बड़ा क्षण था। यहीं से उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हो गई।
7. जब राष्ट्रपति भवन तक गूंजी पंडवानी
तीजन बाई ने कई बार राष्ट्रपति भवन में अपनी प्रस्तुतियां दीं। देश के सर्वोच्च पद पर बैठे लोगों ने उनकी कला की सराहना की।
बाद के वर्षों में उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा गया।
राष्ट्रपति भवन में सम्मानित होना किसी भी लोक कलाकार के लिए सबसे बड़े गौरव की बात होती है और तीजन बाई ने यह गौरव कई बार हासिल किया।
8. गांव की चौपाल से निकलकर 17 देशों तक पहुंची आवाज
जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, तुर्की, मॉरीशस और स्विट्जरलैंड समेत 17 से अधिक देशों में उन्होंने पंडवानी की प्रस्तुति दी।
विदेशी दर्शक भले ही छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं समझते थे, लेकिन उनके अभिनय और आवाज का प्रभाव ऐसा था कि लोग मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते थे।
उन्होंने साबित कर दिया कि कला की कोई भाषा नहीं होती।
9. बिना स्कूल गए बनीं ‘डॉक्टर’
तीजन बाई ने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।
लेकिन उनकी कला और योगदान को देखते हुए कई संस्थानों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।
यह उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मानते हैं कि सफलता केवल बड़ी डिग्रियों से मिलती है।
10. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन कर पूछा था हाल
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं फोन कर तीजन बाई का हालचाल पूछा था।
उस बातचीत का वीडियो और तस्वीरें काफी चर्चा में रही थीं। इससे यह साफ हो गया था कि देश का सर्वोच्च नेतृत्व भी इस लोक कलाकार के प्रति कितना सम्मान रखता है।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री ने उन्हें भारतीय लोककला की अपूरणीय क्षति बताया।
पुरस्कारों से भरी रही जिंदगी
- पद्मश्री, 1988
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1995
- पद्म भूषण, 2003
- नृत्य शिरोमणि सम्मान
- फुकुओका पुरस्कार, जापान
- पद्म विभूषण, 2019
इन सम्मानों ने सिर्फ तीजन बाई का नहीं, बल्कि पूरी पंडवानी परंपरा का सम्मान बढ़ाया।
एक कलाकार नहीं, एक युग थीं तीजन बाई
Teejan Bai 10 unheard stories: तीजन बाई के जाने से सिर्फ छत्तीसगढ़ ने नहीं, बल्कि भारतीय लोककला ने अपनी सबसे बड़ी आवाजों में से एक को खो दिया है।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर जुनून और प्रतिभा हो, तो गांव की मिट्टी से उठी आवाज भी दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंच सकती है।
आज जब उनकी आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई है, तब भी महाभारत के वे प्रसंग, उनका तंबूरा, उनकी बुलंद आवाज और मंच पर उनका अद्भुत अभिनय आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
तीजन बाई चली गईं, लेकिन पंडवानी की हर गूंज में उनका नाम हमेशा जीवित रहेगा।



