
Bilaspur Court Adverse Possession: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से जमीन के अधिकार को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला कानूनी फैसला सामने आया है। एक ग्रामीण द्वारा करीब 33 वर्षों तक सरकारी जमीन पर लगातार खेती करने के मामले में अदालत ने उसे ही उस भूमि का असली मालिक मान लिया है। बिलासपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने प्रतिकूल कब्जा यानी ‘एडवर्स पजेशन’ के पुराने कानूनी सिद्धांत को आधार बनाते हुए पीड़ित ग्रामीण नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के हक में अपना अंतिम फैसला सुनाया है।
पिता के जमाने से खसरा नंबर 894 की सरकारी जमीन पर हो रही थी लगातार खेती
Narayan Prasad Suryavanshi Case: इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत बिलासपुर के सर्वन देवरी गांव से हुई थी। यहां स्थित सरकारी खसरा नंबर 894 की लगभग 0.340 हेक्टेयर भूमि पर नारायण प्रसाद के पिता बिसराम सूर्यवंशी वर्षों से हल चला रहे थे। साल 1988 में 30 मई को तत्कालीन नायब तहसीलदार ने मौके की स्थिति को देखते हुए बिसराम के इस कब्जे को बकायदा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भी किया था। पिता की मृत्यु हो जाने के बाद उनके बेटे नारायण प्रसाद ने भी उसी जमीन पर पारंपरिक रूप से कृषि कार्य जारी रखा।
साल 2001 में ग्राम पंचायत के दखल के बाद शुरू हुआ कानूनी दांवपेंच का दौर
इस जमीन को लेकर असली विवाद साल 2001 में तब भड़का जब स्थानीय ग्राम पंचायत ने अचानक उस जमीन पर अपना हक जताते हुए वहां लगे पेड़ों को काटने की कोशिश की। नारायण प्रसाद ने इसका कड़ा विरोध किया और मामला सीधे अदालत की चौखट पर पहुंच गया। पिछले दो दशकों के दौरान यह जमीन विवाद जिला न्यायालय से होते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा। इसके बाद नए सिरे से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जिला अदालत ने यह फैसला दिया है।
तीन दशक से अधिक समय का शांतिपूर्ण और निर्बाध कब्जा कोर्ट में हुआ साबित
जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का बारीकी से परीक्षण किया। अपीलीय अदालत ने अपने फैसले में साफ माना कि वादी नारायण प्रसाद ने पुख्ता सबूतों के दम पर यह साबित कर दिया है कि उस सरकारी जमीन पर उनका तीन दशक से भी अधिक समय से खुला, शांतिपूर्ण और बिना किसी रोक-टोक के लगातार कब्जा रहा है। इस आधार पर अदालत ने माना कि वह प्रतिकूल कब्जे के नियम के तहत जमीन का कानूनी मालिकाना हक पाने का हकदार है।
निचली अदालत के पुराने फैसले को जिला जज ने किया पूरी तरह से खारिज
इस फैसले के साथ ही जिला न्यायालय ने सिविल जज बिलासपुर द्वारा 3 अगस्त 2023 को दिए गए उस पुराने आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है जिसमें नारायण प्रसाद के मालिकाना हक और स्थायी रोक संबंधी दावे को तकनीकी कमियों का हवाला देकर खारिज कर दिया गया था। जिला जज ने माना कि निचली अदालत ने यह समझने में बड़ी गलती की थी कि वादी को साल 1988 से पहले के भी कब्जे का अलग से सबूत देना होगा, जबकि तत्कालीन नायब तहसीलदार का आदेश ही कब्जे की पुष्टि के लिए काफी था।
33 साल 11 महीने की लंबी अवधि के सामने राज्य शासन का पक्ष पड़ा कमजोर
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार नारायण प्रसाद का उस विवादित भूमि पर 30 मई 1988 से लेकर 12 मई 2022 तक यानी कुल 33 वर्ष 11 महीने से भी अधिक समय तक लगातार कृषि कब्जा रहा है। कानूनन सरकारी जमीन पर प्रतिकूल कब्जे का दावा मजबूत करने के लिए न्यूनतम 30 वर्ष की निरंतर अवधि निर्धारित की गई है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ग्रामीण द्वारा पेश किए गए मौखिक और राजस्व विभाग के दस्तावेजी साक्ष्यों का राज्य शासन का अमला कोई ठोस या प्रभावी खंडन कोर्ट के सामने पेश नहीं कर सका।
बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए ग्रामीण को जमीन से बेदखल नहीं कर पाएगी सरकार
अदालत ने नारायण प्रसाद के हक में डिक्री जारी करते हुए राज्य शासन, कलेक्टर और राजस्व विभाग के तमाम स्थानीय अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि नारायण प्रसाद के शांतिपूर्ण कब्जे और खेती के काम में किसी भी तरह का प्रशासनिक हस्तक्षेप न किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने साफ कर दिया कि कानून द्वारा तय की गई उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना अब उस ग्रामीण को उस जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत ने राजस्व रिकॉर्ड में भी नारायण प्रसाद का नाम दर्ज करने को कहा है।
जानिए क्या कहता है प्रतिकूल कब्जा यानी एडवर्स पजेशन का यह खास कानून
भारतीय कानून व्यवस्था में लिमिटेशन एक्ट के तहत प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) एक बेहद खास प्रावधान है। इसके सीधे और सरल नियम के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी जमीन पर लगातार 30 वर्षों तक बिना किसी कानूनी रोक-टोक, बिना किसी छिपे हुए विवाद और पूरी तरह से खुले तौर पर खेती या निवास कर रहा है और इस लंबी अवधि के दौरान सरकार या संबंधित विभाग ने उसके खिलाफ कोई बेदखली की कानूनी कार्रवाई नहीं की है, तो उस व्यक्ति को उस संपत्ति पर वैध रूप से मालिकाना अधिकार मिल जाता है।



