
रायपुर: छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग ने आरटीई (शिक्षा का अधिकार) के तहत निजी स्कूलों में होने वाले प्रवेश नियमों में बड़ा बदलाव कर दिया है। 16 दिसंबर 2025 को जारी नए आदेश के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में केवल कक्षा पहली से ही प्रवेश दिया जाएगा। अब तक गरीब बच्चों को नर्सरी, पीपी-1 और पीपी-2 जैसे प्री-प्राइमरी स्तरों पर भी दाखिला मिलता था, जिसे अब पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इस फैसले से उन हजारों परिवारों को झटका लगा है जो अपने बच्चों की शिक्षा की नींव निजी स्कूलों के शुरुआती स्तर से रखना चाहते थे।
कानून के उल्लंघन का आरोप: पैरेंट्स एसोसिएशन ने दी आंदोलन और कानूनी लड़ाई की चेतावनी
छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन ने सरकार के इस कदम की तीखी निंदा की है। एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष किष्टोफर पॉल का कहना है कि यह निर्णय आरटीई कानून की धारा 12(1)(ग) का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि कानून में स्पष्ट है कि यदि कोई स्कूल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा देता है, तो उसे 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखनी होंगी। पॉल ने कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रवेश के दो स्तरों को खत्म करना बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने सरकार से इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की है, अन्यथा मामले को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
क्यों खतरनाक है यह फैसला? विशेषज्ञों ने बताया बच्चों के भविष्य पर होने वाला बुरा असर
शिक्षाविदों का मानना है कि प्री-प्राइमरी शिक्षा को आरटीई से बाहर करने के गंभीर परिणाम होंगे। 3 से 6 साल की उम्र बच्चे के मानसिक विकास के लिए सबसे अहम होती है। निजी स्कूलों में सीधे पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाला गरीब बच्चा उन अमीर बच्चों के मुकाबले पीछे रह जाएगा जो नर्सरी से वहीं पढ़ रहे हैं। इससे बच्चों के बीच ‘लर्निंग गैप’ यानी सीखने का अंतर बढ़ेगा। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इससे सामाजिक असमानता और गहरी होगी क्योंकि गरीब बच्चों को वह शुरुआती मंच नहीं मिलेगा जो संपन्न परिवारों के बच्चों को आसानी से उपलब्ध है।
वित्तीय बोझ कम करने की कोशिश? स्कूलों और अभिभावकों ने सरकार की नीयत पर उठाए सवाल
इस फैसले के पीछे सरकार की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि सरकार प्री-प्राइमरी स्तर पर दी जाने वाली फीस वापसी (रीइंबर्समेंट) के खर्च से बचना चाहती है। छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने भी इसे ‘आरटीई विरोधी’ करार दिया है। उनका कहना है कि सरकार अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से बचने के लिए गरीब बच्चों को शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण चरण से दूर धकेल रही है। वहीं, शिक्षा विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि इससे प्रवेश प्रक्रिया सरल होगी और धांधलियों पर रोक लगेगी, लेकिन धरातल पर अभिभावक इसे अपने अधिकारों में कटौती मान रहे हैं।
बढ़ सकता है ड्रॉपआउट रेट: शुरुआती नींव कमजोर होने से पढ़ाई छोड़ने का बना रहेगा डर
शिक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि बच्चों की शुरुआती नींव कमजोर रही, तो आगे चलकर उनमें पढ़ाई के प्रति अरुचि पैदा हो सकती है। गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा न मिलने से बच्चों का मनोबल टूटता है, जिससे स्कूलों में ड्रॉपआउट (पढ़ाई बीच में छोड़ना) की दर बढ़ने का खतरा रहता है। आरटीई का मूल लक्ष्य समाज के हर वर्ग को समान अवसर देना था, लेकिन नए नियमों से समावेशी शिक्षा का यह उद्देश्य कमजोर होता दिख रहा है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार चौतरफा विरोध को देखते हुए अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगी या यह मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझकर रह जाएगा।



