
छत्तीसगढ़ के महिला बाल विकास विभाग में ‘सक्षम आंगनबाड़ी योजना’ के तहत करोड़ों की खरीदी में बड़ी गड़बड़ी का मामला सामने आया है। विभाग ने 16.61 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट को छोटे-छोटे 155 टुकड़ों में बांट दिया है, ताकि बड़े टेंडर की प्रक्रिया से बचा जा सके। आमतौर पर इतनी बड़ी राशि के सामान की खरीदी के लिए केंद्रीय स्तर पर ग्लोबल टेंडर निकाला जाता है, जिसमें सामान की गुणवत्ता और वारंटी की सख्त शर्तें होती हैं। लेकिन इस बार नियम बदलकर ब्लॉक स्तर पर आनन-फानन में खरीदी की जा रही है, जिससे भ्रष्टाचार और घटिया सामान की सप्लाई की आशंका बढ़ गई है।
बजट लैप्स होने का डर या सोची-समझी साजिश?
सक्षम आंगनबाड़ी योजना में 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार का और 40 प्रतिशत राज्य सरकार का होता है। पिछले दो सालों से यह बजट विभाग के पास रखा हुआ था, लेकिन पूरे साल टेंडर नहीं निकाला गया। अब जब वित्तीय वर्ष खत्म होने में महज कुछ दिन बचे हैं, तब 19 मार्च की रात को आनन-फानन में सभी ब्लॉक अधिकारियों को खुद अपने स्तर पर खरीदी करने का आदेश जारी कर दिया गया। 25 मार्च के बाद सरकारी खजाने से बिल पास होना बंद हो जाते हैं, ऐसे में सवाल उठ रहा है कि साल भर सुस्त बैठा विभाग आखिरी 6 दिनों में इतनी बड़ी खरीदी कैसे पूरी करेगा।
2899 केंद्रों के लिए बिना मापदंड के सामान की खरीदी
प्रदेश के 2899 आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाने के लिए टीवी और वाटर प्यूरीफायर (आरओ) खरीदे जा रहे हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग ने ब्लॉक स्तर पर यह तो बता दिया कि 25 हजार की टीवी और 10 हजार का आरओ लेना है, लेकिन उनकी क्वालिटी और साइज को लेकर कोई गाइडलाइन नहीं दी। इसका फायदा उठाकर ठेकेदार मनमाने रेट पर कोई भी साधारण या चाइनीज कंपनी का सामान सप्लाई कर रहे हैं। अगर केंद्रीय टेंडर होता, तो बड़ी कंपनियां हिस्सा लेतीं और पूरे प्रदेश के केंद्रों में एक जैसा और टिकाऊ सामान पहुंचता।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग और पेंटिंग में भी बंदरबांट का आरोप
सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स सामान ही नहीं, बल्कि आंगनबाड़ियों में होने वाली वाल पेंटिंग और रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में भी इसी तरह का खेल चल रहा है। हर केंद्र को पेंटिंग के लिए 10 हजार और हार्वेस्टिंग के लिए 16 हजार रुपये भेजे गए हैं। इसमें भी कोई तकनीकी शर्त नहीं रखी गई है कि सिस्टम कैसा होगा या पेंट की क्वालिटी क्या होगी। बस यह कह दिया गया है कि इतने बजट में काम करवा लें। बिना किसी ठोस योजना के हो रहे इस काम से सरकारी पैसे की बर्बादी तय मानी जा रही है।
जेम पोर्टल की आड़ में ‘मैनेज’ हो रहे हैं कोटेशन
विभागीय जांच और एक्सपर्ट्स का कहना है कि 10 लाख रुपये से कम की खरीदी के लिए बड़े टेंडर की जरूरत नहीं होती, इसी नियम का फायदा उठाया जा रहा है। हर ब्लॉक को टीवी के लिए 5 लाख और आरओ के लिए 2 लाख रुपये के आसपास बजट दिया गया है। जेम (GeM) पोर्टल पर ठेकेदार खुद ही तीन अलग-अलग फर्म के नाम से कोटेशन बनाकर दे रहे हैं, जिसमें से एक को काम दे दिया जा रहा है। इस प्रक्रिया में न तो सामान का भौतिक सत्यापन ठीक से हो रहा है और न ही भविष्य में वारंटी की कोई गारंटी है।
तीन दिन की छुट्टी और करोड़ों का भुगतान
सरकारी कैलेंडर के हिसाब से मार्च के आखिरी हफ्ते में तीन दिन की छुट्टियां हैं। विभाग के पास काम पूरा करने, सामान की सप्लाई लेने, बिल ट्रेजरी में लगाने और भुगतान करने के लिए प्रभावी रूप से सिर्फ तीन दिन बचे हैं। इतनी कम अवधि में 16 करोड़ रुपये का काम जमीन पर उतारना मुमकिन नहीं दिखता। जानकारों का कहना है कि यह सब केवल कागजों पर खानापूर्ति कर बजट को ठिकाने लगाने की कोशिश है। गरियाबंद के देवभोग और मैनपुर जैसे इलाकों में तो सप्लाई और भुगतान की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।
जिम्मेदारों की सफाई: केंद्र से देर से मिली राशि
इस पूरे मामले पर महिला एवं बाल विकास विभाग की संचालक रेणुका श्रीवास्तव का कहना है कि केंद्र सरकार ने 18 मार्च को राशि भेजी, जिसके तुरंत बाद इसे ब्लॉक स्तर पर ट्रांसफर कर दिया गया। उनके मुताबिक, जेम पोर्टल पर टेंडर लाइव है और सबसे कम रेट (L-1) वाले से ही खरीदी की जा रही है। विभाग का दावा है कि मापदंड पहले ही तय कर दिए गए थे। हालांकि, ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है, जहां ब्लॉक स्तर पर बिना किसी ठोस वेरिफिकेशन के पेमेंट की तैयारी चल रही है।
क्या होगा आंगनबाड़ियों का भविष्य?
अगर इसी तरह बिना किसी गुणवत्ता नियंत्रण के सामान की खरीदी होती रही, तो चंद महीनों में ही ये टीवी और आरओ खराब होकर कबाड़ में तब्दील हो जाएंगे। पिछली बार जब केंद्रीय टेंडर से आरओ खरीदे गए थे, तब एक नामी कंपनी ने सप्लाई दी थी जिसकी सर्विस आज भी मिल रही है। लेकिन इस बार टुकड़ों में बांटी गई इस खरीदी ने पूरी योजना की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना होगा कि क्या प्रशासन इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराता है या फिर करोड़ों का यह बजट फाइलों में ही दफन हो जाएगा।



