राजिम कुंभ के टेंडर पर सियासी संग्राम: जंबूरी के बाद अब संगम पर भ्रष्टाचार के आरोप, कांग्रेस बोली- चहेतों को फायदा पहुंचाने की तैयारी

गरियाबंद: छत्तीसगढ़ में नेशनल जंबूरी को लेकर मचे बवाल के बीच अब ‘राजिम कुंभ’ भी विवादों के घेरे में आ गया है। त्रिवेणी संगम पर होने वाले इस भव्य आयोजन की टेंडर प्रक्रिया पर उंगलियां उठने लगी हैं। सारा विवाद टेंडर के लिए दिए गए समय को लेकर है। जिला कलेक्टर कार्यालय ने बुधवार को एक अखबार में इवेंट से संबंधित दो अलग-अलग टेंडर जारी किए हैं। हैरानी की बात यह है कि 7 जनवरी को विज्ञापन छपा, 8 तारीख को प्री-बीड मीटिंग तय की गई और 9 जनवरी को टेंडर जमा करने की आखिरी तारीख रख दी गई। 10 जनवरी को प्रेजेंटेशन के साथ ही प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। जानकारों का कहना है कि आमतौर पर ऑनलाइन टेंडर के लिए कम से कम 21 दिन का समय दिया जाता है, लेकिन यहां महज 72 घंटों में सारा काम निपटाने की तैयारी है।

कांग्रेस का सीधा हमला: ‘पहले से तय है किसे मिलेगा ठेका’, जिला प्रशासन की चुप्पी ने बढ़ाया संदेह

कांग्रेस जिला अध्यक्ष सुखचंद बेसरा ने इस पूरी प्रक्रिया को फर्जीवाड़ा करार दिया है। उनका कहना है कि किसी भी ठेकेदार को कोटेशन और पीपीटी तैयार करने में कम से कम पांच दिन का वक्त चाहिए होता है। ऐसे में तीन दिन की समय सीमा का मतलब साफ है कि प्रशासन ने पहले से ही अपनी पसंद की कंपनी तय कर ली है और यह विज्ञापन सिर्फ एक औपचारिकता है। बेसरा ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार करने के लिए जानबूझकर नियमों की अनदेखी की गई है। इस पूरे मामले पर जब कलेक्टर भगवान सिंह उईके का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया, जिससे संदेह और गहरा गया है।

पहली बार कलेक्ट्रेट को मिली जिम्मेदारी: पर्यटन विभाग से छिनकर जिला प्रशासन के पास आया करोड़ों का बजट

राजिम कुंभ के दौरान होने वाले करोड़ों रुपये के खर्च का हिसाब-किताब पहले धर्मस्व और पर्यटन मंत्रालय के पास होता था। भाजपा सरकार ने पहली बार यह जिम्मेदारी जिला कलेक्ट्रेट को सौंपी है। पहली ही बार में टेंडर प्रक्रिया विवादों में आ गई है। स्थानीय लोगों और ठेकेदारों के बीच भी इस बात को लेकर नाराजगी है कि उन्हें तैयारी का मौका ही नहीं दिया गया। करोड़ों के इस प्रोजेक्ट में पारदर्शिता की कमी ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है।

क्या कहते हैं नियम: 21 दिन की अनिवार्य अवधि का हुआ उल्लंघन, पुराने अनुभवों से नहीं लिया सबक

सरकारी खरीदी और टेंडरिंग के नियमों के मुताबिक, किसी भी बड़े आयोजन के लिए विज्ञापन प्रकाशन और क्लोजिंग के बीच पर्याप्त समय होना अनिवार्य है। इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Healthy Competition) को बढ़ावा मिलता है। राजिम कुंभ जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन में महज तीन दिन का समय देना तकनीकी और कानूनी रूप से गलत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी जल्दबाजी केवल तब की जाती है जब किसी खास वेंडर को लाभ पहुंचाना हो। इससे पहले जंबूरी के टेंडर में भी ऐसे ही आरोप लगे थे, लेकिन प्रशासन ने उस गलती से कोई सबक नहीं लिया।

राजिम कुंभ की साख पर खतरा: आस्था के केंद्र में ‘कमीशन’ का खेल, ग्रामीणों में भी है आक्रोश

राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग माना जाता है और यहां देशभर से श्रद्धालु आते हैं। आस्था के इस बड़े केंद्र से जुड़ी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता न होना लोगों को अखर रहा है। ग्रामीण इलाकों में यह चर्चा आम है कि करोड़ों के बजट का बंदरबांट करने के लिए कागजी खानापूर्ति की जा रही है। अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में यह मुद्दा सरकार के लिए गले की हड्डी बन सकता है। विपक्षी दल अब इस मामले को लेकर सड़क पर उतरने और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दे रहे हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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