छत्तीसगढ़ में ठप होंगे 50 हजार आंगनबाड़ी केंद्र: 26 फरवरी से प्रदेशभर में हड़ताल, कार्यकर्ता और सहायिकाओं ने खोला मोर्चा

आइसीडीएस (ICDS) की स्थापना को 50 साल बीत चुके हैं, लेकिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की आर्थिक स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है। वर्तमान में केंद्र सरकार की ओर से सहायिकाओं को मात्र 2,250 रुपये और कार्यकर्ताओं को 4,500 रुपये का मानदेय दिया जा रहा है। राज्य सरकार के अंश को मिलाकर कार्यकर्ताओं को कुल 10 हजार और सहायिकाओं को 5 हजार रुपये मिलते हैं। प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि इतने लंबे समय बाद भी उन्हें न तो पेंशन की सुविधा दी गई है और न ही ग्रेच्युटी या समूह बीमा का लाभ मिल रहा है।

अवकाश का अभाव और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ

आंगनबाड़ी कर्मियों का दर्द है कि उन्हें बच्चों की शादी, स्वयं की लंबी बीमारी या परिवार के किसी सदस्य की देखभाल के लिए कोई आधिकारिक छुट्टी नहीं दी जाती। यदि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए छुट्टी लेती हैं, तो उनके मानदेय में कटौती कर दी जाती है। बिना किसी सामाजिक सुरक्षा और अवकाश लाभ के, ये महिलाएं पिछले कई दशकों से सेवाएं दे रही हैं, जिससे अब उनके भीतर असंतोष पनपने लगा है।

बहुउद्देशीय कार्यों का बोझ और विभागीय दबाव

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अब एक बहुउद्देशीय कर्मचारी बना दिया गया है। मूल काम महिला एवं बाल विकास विभाग का है, लेकिन उनसे चुनाव, जनगणना और स्वास्थ्य समेत लगभग सभी सरकारी विभागों का काम लिया जाता है। यहां तक कि सरकारी सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए भी उन्हें तैनात कर दिया जाता है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभिन्न विभागों के अधिकारी उन पर नियंत्रण थोपते हैं और काम पूरा न होने पर सीधे कार्रवाई की धमकी दी जाती है।

अफसरों की प्रताड़ना और नौकरी से निकालने की धमकी

संयुक्त मंच के पदाधिकारियों ने विभागीय अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि विभागीय अफसर उनका साथ देने के बजाय बात-बात पर मानदेय काटने और नौकरी से बर्खास्त करने की धमकियां देते हैं। अधिकारियों का व्यवहार गुलामी जैसा महसूस होता है और जब भी वे अपने हक की आवाज उठाती हैं, तो उन्हें कानूनी नोटिस या नौकरी से हटाने की कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। इसी प्रताड़ना से तंग आकर अब एक लाख से अधिक महिलाएं सड़क पर उतरने को मजबूर हैं।

दो चरणों में होगा आंदोलन: जिला मुख्यालय से राजधानी तक घेराव

आंगनबाड़ी संगठनों ने अपने हक के लिए दो चरणों में आंदोलन की रूपरेखा तैयार की है। पहले चरण में 26 और 27 फरवरी को प्रदेश के सभी 33 जिला मुख्यालयों में काम बंद हड़ताल और रैली निकाली जाएगी। इस दौरान कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा। यदि इसके बाद भी उनकी मांगें पूरी नहीं होती हैं, तो दूसरे चरण के तहत 9 मार्च को राजधानी रायपुर में विशाल प्रांतीय धरना दिया जाएगा और विधानसभा का घेराव किया जाएगा।

संगठनों की एकजुटता और भविष्य की रणनीति

छत्तीसगढ़ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका संघ के संस्थापक देवेंद्र कुमार पटेल और संरक्षक आरके थवाईत ने स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई उनके अस्तित्व और सम्मान की है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार उन्हें सरकारी कर्मचारियों से ज्यादा जिम्मेदार मानती है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर उनके हाथ खाली हैं। 26 फरवरी से शुरू हो रही इस हड़ताल से प्रदेश के 50 हजार से अधिक केंद्रों में ताले लटक सकते हैं, जिससे पोषण आहार और बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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