CG Yoga Commission Department Change: छत्तीसगढ़ में अब स्वास्थ्य विभाग संभालेगा योग: समाज कल्याण से हटाए जाने पर उठे सवाल, क्या फाइलों को ठंडे बस्ते में डालने की है तैयारी

CG Yoga Commission Department Change: छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए योग आयोग के संचालन की जिम्मेदारी समाज कल्याण विभाग से छीनकर स्वास्थ्य विभाग को सौंप दी है. शासन इस बदलाव को पूरी तरह प्रशासनिक और व्यावहारिक सुधार बता रहा है, लेकिन इस फैसले के साथ ही योग आयोग से जुड़े पुराने विवाद और वित्तीय गड़बड़ियों के मामले एक बार फिर गरमा गए हैं. राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या यह बदलाव वास्तव में योग को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए किया गया है, या फिर पिछले कुछ वर्षों में आयोजनों के नाम पर हुए करोड़ों रुपये के खर्च की फाइलों को दबाने की एक सोची-समझी रणनीति है.

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मुख्य उद्देश्य से भटका योग आयोग, जन-जन तक पहुंचने के बजाय सिर्फ एक दिन का आयोजन बनकर रह गया विभाग

छत्तीसगढ़ योग आयोग का गठन वर्ष 2017 में इस मुख्य उद्देश्य के साथ किया गया था कि योग को राज्य के प्रत्येक नागरिक की जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए और इसे गंभीर बीमारियों के इलाज की एक वैकल्पिक पद्धति के रूप में स्थापित किया जा सके. हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही. बीते वर्षों में आयोग की पहचान महज 21 जून को मनाए जाने वाले ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के एकदिवसीय सरकारी आयोजन तक ही सीमित होकर रह गई. पूरे साल आयोग की मैदानी गतिविधियां पूरी तरह ठप रहती थीं, लेकिन जून का महीना आते ही करोड़ों रुपये का सरकारी बजट पानी की तरह बहाने के लिए खोल दिया जाता था.

साल 2024 तक योग दिवस के नाम पर फूके गए 14 करोड़ रुपये, शिकायतों के बाद भी नहीं तय हुई किसी की जवाबदेही

विभागीय सूत्रों और दस्तावेजों से मिली जानकारी के अनुसार, शुरुआत के सालों में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन पर औसतन तीन से चार करोड़ रुपये खर्च किए जाते थे. बाद के वर्षों में इस वीआईपी आयोजन का बजट लगातार बढ़ता चला गया और साल 2024 तक यह कुल खर्च लगभग 14 करोड़ रुपये के भारी-भरकम आंकड़े तक पहुंच गया. आरोप है कि जैसे-जैसे आयोजन की भव्यता और बजट बढ़ता गया, वैसे-वैसे इसमें वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें भी बढ़ती गईं. गंभीर आरोप लगने के बाद भी शासन स्तर पर कभी कोई बड़ी विभागीय जांच नहीं कराई गई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्रवाई की गई.

ट्रैक सूट और ब्रांडेड स्पोर्ट्स जूतों की खरीदी में बड़ा खेल, छह हजार रुपये दिखाई गई एक सेट की कीमत

योग दिवस के भव्य आयोजनों के दौरान की जाने वाली सामग्री खरीदी हमेशा से ही विवादों के केंद्र में रही है. विभागीय जांच की फाइलों के मुताबिक, हर साल लगभग 5000 विशिष्ट ट्रैक सूट खरीदने का ऑर्डर जारी किया जाता था. सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में प्रति ट्रैक सूट की अनुमानित कीमत लगभग 6000 रुपये दर्शाई जाती थी. इसके साथ ही वीआईपी मेहमानों और अधिकारियों के लिए खरीदे जाने वाले स्पोर्ट्स शू की कीमत भी करीब 2500 रुपये प्रति जोड़ी दिखाई जाती थी. आरोप है कि वास्तविक बाजार मूल्य से कई गुना अधिक खर्च दिखाकर भारी कमीशनखोरी की गई.

टेंट-कालीन होने के बाद भी खरीदे गए हजारों योगा मैट, कार्यक्रम खत्म होते ही गायब हो जाता था पूरा स्टॉक

अनियमितताओं की सूची में योगा मैट की खरीदी का मामला भी काफी बड़ा है. कार्यक्रम के लिए बड़े-बड़े वाटरप्रूफ टेंट और नीचे मोटी कालीन बिछाने की मुकम्मल व्यवस्था ठेकेदारों द्वारा की जाती थी, इसके बावजूद हर साल अलग से हजारों नए योगा मैट खरीदे जाते थे. आरोप है कि मुख्य समारोह समाप्त होने के बाद हर साल करीब 5000 योगा मैट मौके से अचानक गायब हो जाते थे. ये कीमती मैट कहां भेजे गए, किसे बांटे गए या किस सरकारी गोदाम में सुरक्षित रखे गए, इसका कोई भी स्पष्ट और प्रामाणिक रिकॉर्ड आज तक विभाग के पास उपलब्ध नहीं है.

योग शिक्षा के नाम पर नाश्ते और वीआईपी भोजन में उड़ाए 5 करोड़, मानदेय न मिलने से घर बैठे असली शिक्षक

विभागीय सूत्रों का कहना है कि योग दिवस के कार्यक्रमों में आए मेहमानों और प्रतिभागियों के भोजन तथा नाश्ते (कैटरिंग) पर भी सरकारी खजाने से बेहिसाब खर्च किया गया. कई वित्तीय वर्षों में केवल खान-पान से जुड़े बिल ही 5 करोड़ रुपये से अधिक के पाए गए हैं, जबकि इसके मुकाबले राज्य में योग शिक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का दायरा बेहद सीमित रहा. दूसरी ओर, जिन स्थानीय योग शिक्षकों को गांवों और कस्बों में योग सिखाने के लिए नियुक्त किया गया था, उन्हें समय पर मानदेय देना बंद कर दिया गया. बजट की कमी का हवाला देकर कई शिक्षकों को सेवा से बाहर कर दिया गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश योग केंद्र पूरी तरह बंद हो गए.

साल 2018 से लगातार आ रही थीं भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतें, हर बार जांच के कोरे आश्वासन देकर दबाया गया मामला

सामग्री की कम सप्लाई होना, नकली बिल लगाना, स्वीकृत बजट और मौके पर मौजूद सामग्री के भौतिक सत्यापन में बड़ा अंतर मिलना जैसी गंभीर शिकायतें साल 2018 से ही लगातार सामने आ रही थीं. जब भी मीडिया या समाजसेवियों द्वारा इन मुद्दों को उठाया गया, तो शासन के उच्च अधिकारियों द्वारा हर बार निष्पक्ष जांच कराने का केवल एक औपचारिक आश्वासन दे दिया जाता था. कुछ दिनों तक मामला अखबारों और चर्चाओं में रहने के बाद विभागीय फाइलों में दबा दिया जाता था, जिसके कारण इतने बड़े घोटाले के बाद भी आज तक विभाग के किसी भी बड़े अफसर या सप्लायर पर कोई कानूनी आंच नहीं आई.

विभाग बदलने से पुराने घोटालों की फाइलों के सुरक्षित रहने पर संशय, नए महकमे में जवाबदेही तय करना बड़ी चुनौती

अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही खड़ा हो गया है कि योग आयोग का प्रशासनिक ढांचा समाज कल्याण विभाग से हटाकर स्वास्थ्य विभाग के अधीन हो जाने के बाद इन पुरानी फाइलों का क्या होगा? सामाजिक संगठनों का आरोप है कि जांच की आंच से बचने और रिकॉर्ड को खुर्द-बुर्द करने के उद्देश्य से ही यह पूरा विभाग बदला गया है. यदि फाइलें नए विभाग में ट्रांसफर की भी जाती हैं, तो क्या पूर्व में हुई आर्थिक गड़बड़ियों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रह पाएगा? सवाल सिर्फ प्रशासनिक फेरबदल का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि योग के नाम पर फूके गए जनता की कमाई के करोड़ों रुपये का हिसाब अब कौन सा विभाग देगा?

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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